Sunday, February 24, 2019

kashmir-chalo कश्मीर चलो

#कश्मीर‌_चलो 
शैव मत का केन्द्र रहे कश्मीर की ओर दोनों मान्य शङ्कराचार्यों (पुरी एवं शृंगेरी) के नेतृत्त्व में धर्मसंसद प्रयाण करे। शस्त्र तो ले जा नहीं सकते, शास्त्र के साथ जाये। सरकार उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करे। 
ऐतिहासिक भूल के सुधार का लक्ष्य ले कर जाये कि जो भी कश्मीरी मुसलमान सनातन धर्म में लौटना चाहते हैं, उनका स्वागत है। उनके पुरातन सारस्वत मूल को देखते हुये शुद्धि के पश्चात उनका यज्ञोपवीत संस्कार किया जायेगा तथा वे एक नयी जाति के रूप में हिंदू धर्म का अंग बन जायेंगे, यह प्रस्ताव रख दें।
सार्वजनिक घोषणा हो, प्रचार हो, किसी को बुलाने न जायें। जो आते हैं, उनको वहीं दीक्षित कर दिया जाय।
महाशिवरात्रि का पावन दिन निकट है, अवसर प्रत्येक दृष्टि से उपयुक्त है। आगे भी विकल्प खुला रहे।
#कश्मीर_का_इतिहास पढ़ते हुये।
#पण्डित‌_श्री‌_भट्ट की स्मृति में।

Wednesday, February 13, 2019

अपोलो, बंगाल एवं मुसलमान


सप्तर्षिवंशज, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अवर्ण, सवर्ण, पञ्चम आदि अनादि पिछले दस वर्षों से मुसलमानों की सचाइयाँ उघाड़ने के कारण मुझसे पीड़ित होते रहे हैं। अनेक बाधित हुये, बाधित कर गये किन्‍तु उससे सचाई परिवर्तित नहीं हो जाती।
आज पुन: कह रहा हूँ:


आप बहुत बड़े संकट में घिर गये हैं। वह संकट इस्लाम है जिसके वाहक मुसलमान हैं। मुसलमान मानव नहीं होते, कैंसर की भाँति सभ्यता एवं संस्कृति के असाध्य शत्रु होते हैं ।

आप जहाँ भी, जिस स्तर पर भी हैं, जितनी भी शक्ति है; मुसलमानों के प्रभाव को काटते चलें। आरम्भ में लड़ने भिंड़ने की आवश्यकता ही नहीं, मस्तिष्क एवं बटुये के बुद्धिमत्तापूर्ण प्रयोग से एक एक हिन्‍दू चाहे तो इनकी रोकथाम में अपना सार्थक योगदान दे सकता है। सायास, चैतन्य हो कर काम करना पड़ेगा।
...
आज अपोलो चिकित्सालय के सबसे बड़े केन्‍द्र पर जाना पड़ा। मेरी आँखें फटी रह गईं। मुझे हर पल चेताने वाली श्रीमती जी भी कह पड़ीं, ये बंगाली अस्पताल है क्या? बाहर बंगाली चाहे जो बकबक करें, वास्तविकता यह है कि उनका बंगाल नष्ट हो चुका है। किञ्चित भी बड़ी समस्या होने पर स्वास्थ्य सेवाओं हेतु आमार सोनार बांगलाबासी यहाँ धँसे चले आ रहे हैं, यकृत प्रत्यारोपण से ले कर मस्तिष्क गाँठ तक, जिधर देखो, उधर ही बांगाली ... आमार सोनार कोलकाता में ढंग का एक चिकित्सालय भी नहीं, ऐसा प्रतीत होता है।
बंगाली को तमिल नहीं आती, तमिल को बंगाली नहीं, दोनों को अंग्रेजी नहीं आती। ऐसे में परस्पर संवाद की भाषा वही है, उस क्षेत्र की भाषा है जिसका 'हिंदुस्तान' कह कर बंगाली पहले उपहास करते थे, आज भी करते मिल जायेंगे - हिंदी।
जहाँ की भाषा से पेरियारियों ने चुन चुन कर संस्कृत के शब्द निकाल दिये, उस घोर हिंदीद्वेषी तमिल क्षेत्र में तमिल एवं बंगाली जन को हिंदी में दु:ख सुख से ले कर औषधियों के प्रयोग तक की बातें करते पा कर मुझ संकीर्णमना का वक्ष गर्व से ५६! अङ्गुल का हो गया।
हे हिंदीभाषियों ! इस देश को तुम्हारी भाषा हिंदी जोड़े हुये है। हिंदी में निष्णात बनो। हिंदी को शुद्ध लिखना एवं बोलना सीखो। हिंदी को समृद्ध करो, हिंदी को जन जन की भाषा बनाओ। काले अंग्रेज चाहे जो कर लें, तिरस्कृत गोबरपट्टी की भाषा हिंदी ही इस देश की परस्पर संवाद की भाषा रहेगी। तुम्हें गुजरातियों से शिक्षा लेनी चाहिये जो कि आधुनिक हिंदी का पहला गढ़ हुआ तथा जहाँ आज भी हिंदी का ज्ञान होना गर्व की बात है।
...

अच्छाइयों के पश्चात आते हैं सङ्कट पर। सङ्कट यह है कि उन बंगालियों में मुसलमान अत्यधिक संख्या में थे। श्रीमती जी भी मेरी इस बात से सहमत हुईं कि संसाधनों पर ऐसे ही ये 'कब्जा' कर लेते हैं। सीमित संसाधनों की स्थिति हो तो यह स्थिति गुणवत्ता वाली मानव जनसंख्या हेतु बहुत दु:खदायी हो जाती है। जहाँ जायेंगे, वहीं बुरका ओढ़े चुड़ैलें तथा दाढ़ी रंगे, मूँछे छिले, बड़े का कुर्ता, छोटे का पायजामा पहने मियाँ पहले से ही स्थान छेकाये मिलेंगे। स्थिति इतनी गंदी कर चुके हैं कि आसन पर अपना मैला झोला, खून, थूक से सने कपड़े रख मियाँइनें जमी मिलेंगी। लोग खड़े रहें किंतु आसन से झोला हटाना नहीं। हिंदू तो वैसे ही बहुत शेखुलर प्राणी होता है, मियाँ मियाँइन को देखते ही उसके रोम रोम से सद्भावना एवं दीनता रिसने लगती हैं किंतु यदि कोई 'साम्प्रदायिक' हो कर, थेथर हो कहे भी कि ऐ प्रोडक्शन मशीन, तुम्हारा पिस्टन तो इधर उधर घूम रहा है, झोला तो नीचे रख दे कि कोई मानव बैठ जाय! तो काले बोरे में भरी माल की कजरारी आँखों से जलते हुये कोयले बरसने लगते हैं मानों कह रही हों - नामाकूल काफिर! बदजुबान, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ऐसा कहने की? जानता नहीं कि हम तुर्कन-मंगोलन-सैयदन सब हैं। इस दारुल हरब की हर वस्तु पर हमारा पहला अधिकार है!
.
मुसलमान गाजर घास हैं, टिड्डी दल हैं, पसरते मरुस्थल हैं। तुर्रा ये कि पूरी ठसक से, अपनी समस्त उज्जडताओं के साथ अपना काम भी कराते हैं।
सबसे बड़ी बात 'आमार सोनार बांगला' के घनचक्कर के कारण इनमें कितने बाँग्लादेशी हैं, आप जान भी नहीं सकते ! कितने घोटाले हो रहे हैं, किसे पता?
...
प्रवचन के अन्त में संक्षेप में जानें कि बंगाल का तो बांग बोका हो चुका है। सावधान रहते हुये सीख नहीं लिये तो आप का भी केरल-कश्मीर होने में अधिक समय शेष नहीं है। सस्य श्यामला को चट करने टिड्डियों का दल प्रजनन में पूरे समर्पण से लगा हुआ है तथा उसका पोषण हिंदू ही कर रहे हैं।
सँभलो, जागो हिंदुओं, जागो!

Monday, February 11, 2019

इन्‍द्र, मेरे लिये दूसरी पत्नी का प्रबन्ध करो !

#पद्मपुराण का विराट यज्ञ आयोजन अद्भुत है। खान पान की सज्जा वरुण करते बताये गये हैं : स्वयं च वरुणो रत्नं दक्षश्चान्नं स्वयं ददौ आगत्य वरुणो लोकात्पक्वं चान्नं स्वतोपचत् ... देवी सावित्री के आने में किञ्चित विलम्ब होने को स्त्रीसुलभ प्रकृति बताते हुये मनोरञ्जक वर्णन है - व्यग्रा सा कार्यकरणे स्त्रीस्वभावेन नागता ! ... सुसत्कृता च पत्नी सा सवित्री च वरांगना अध्वर्युणा समाहूता एहि देवि त्वरान्विता उत्थिताश्चाग्नयः सर्वे दीक्षाकाल उपागतः व्यग्रा सा कार्यकरणे स्त्रीस्वभावेन नागता इहवै न कृतं किंचिद्द्वारे वै मंडनं मया भित्त्यां वैचित्रकर्माणि स्वस्तिकं प्रांगणेन तु प्रक्षालनं च भांडानां न कृतं किमपि त्विह लक्ष्मीरद्यापि नायाता पत्नीनारायणस्य या अग्नेः पत्नी तथा स्वाहा धूम्रोर्णा तु यमस्य तु वारुणी वै तथा गौरी वायोर्वै सुप्रभा तथा ऋद्धिर्वैश्रवणी भार्या शम्भोर्गौरी जगत्प्रिया मेधा श्रद्धा विभूतिश्च अनसूया धृतिः क्षमा गंगा सरस्वती चैव नाद्या याताश्च कन्यकाः इंद्राणी चंद्रपत्नी तु रोहिणी शशिनः प्रियाः अरुंधती वसिष्ठस्य सप्तर्षीणां च याः स्त्रियः अनसूयात्रिपत्नी च तथान्याः प्रमदा इह वध्वो दुहितरश्चैव सख्यो भगिनिकास्तथा नाद्यागतास्तु ताः सर्वा अहं तावत्स्थिता चिरं नाहमेकाकिनी यास्ये यावन्नायांति ता स्त्रियः ब्रूहि गत्वा विरंचिं तु तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम् सर्वाभिः सहिता चाहमागच्छामि त्वरान्विता सर्वैः परिवृतः शोभां देवैः सह महामते ... अध्वर्युओं ने पुकारा, ब्रह्मा जी मुण्डन करा कर आसन ग्रहण कर चुके हैं, आप भी चलें, दीक्षा का समय आ चुका है। सावित्री जी को शीघ्रता नहीं थी - द्वार की शोभा अभी मैंने की ही नहीं, भित्तियों पर विचित्र चित्रण भी नहीं किया, न प्राङ्गण में स्वस्तिक बनाया। भाण्ड (बर्तन) धोये ही नहीं गये अभी तो ! नारायण की पत्नी लक्ष्मी भी अभी तक नहीं आयी हैं, न अग्नि की पत्नी स्वाहा, न यम की पत्नी धूम्रोर्णा, न वरुण की गौरी आयी हैं, न वायु की सुप्रभा, कुबेर की ऋद्धि भी नहीं आई हैं अभी तक, न सारे जग की आराध्या एवं शम्भु की पत्नी गौरी ही आई हैं अभी तक ... ... सावित्री गिनाती गईं, अलानी नहीं आईं, फलानी नहीं आईं, बहुयें, सखियाँ, बहनें, बेटियाँ अभी तक आईं ही नहीं। मैं अकेली जाने कब से सबकी प्रतीक्षा में हूँ। मुझे वहाँ अकेली नहीं जाना। जा के कह दो ब्रह्मा जी से, कि किञ्चित प्रतीक्षा करें, सब आ जायें तो लिवा के आती हूँ झड़क के‍! (बड़ी शीघ्रता लगी है हुंह!) :) मुहूर्त निकला जा रहा था, उस में ब्रह्मा ने जब यह संदेश सुना तो पिनक गये ! ऐ इन्द्र ! मेरे लिये दूसरी पत्नी ले कर आओ - पत्नीं चान्यां मदर्थे वै शीघ्रं शक्र इहानय ! ____________________ घर में यज्ञ आयोजन हो तो प्रकारांतर से यह समझाया गया है कि पुरुष तो अपने बहेड़े करते रहेंगे, घरनियों को चौका पूर देना चाहिये, भित्तियों को सजा देना चाहिये, घर स्वच्छ कर देना चाहिये, ऐसा न हो कि यज्ञ हो रहा है तथा घर में जूठे वासन पड़े हैं। स्त्री सम्बंधियों, सखियों, पड़ोसनों आदि को जुटा लेना चाहिये। ... ... हाँ तो ब्रह्मा जी को दूसरी पत्नी मिलीं एक आभीरकन्या। नाम था - गायत्री। इंद्र जैसे पारखी को भी समस्त ब्रह्माण्ड में वैसी सुंदरी नहीं दिखी थी। परिचय पूछे तो बोली कि आभीरकन्या हूँ, दूध, दही, नवनीत, मट्ठा बेंचती हूँ। जो चाहिये, बताओ, मिलेगा। ... गोपकन्या त्वहं वीर विक्रीणामीह गोरसम् । नवनीतमिदं शुद्धं दधि चेदं विमंडकम् ॥ दध्ना चैवात्र तक्रेण रसेनापि परंतप । अर्थी येनासि तद्ब्रूहि प्रगृह्णीष्व यथेप्सितम् ॥ इंद्र ने बाँह पकड़ी तथा ब्रह्मा के समक्ष ला बिठाये। दोनों एक दूसरे को देख कामबाण से आहत हो गये। विष्णु जी के सुझाव पर ब्र्ह्मा जी ने गायत्री से गंधर्व विवाह कर लिया। ... गायत्री का रूप वर्णन नीचे दिया हुआ है : सरागो यदि वा स्यात्तु सफलस्त्वेष मे श्रमः नीलाभ्र कनकांभोज विद्रुमाभां ददर्श तां त्विषं संबिभ्रतीमंगैः केशगंडे क्षणाधरैः मन्मथाशोकवृक्षस्य प्रोद्भिन्नां कलिकामिव प्रदग्धहृच्छयेनैव नेत्रवह्निशिखोत्करैः धात्रा कथं हि सा सृष्टा प्रतिरूपमपश्यता कल्पिता चेत्स्वयं बुध्या नैपुण्यस्य गतिः परा उत्तुंगाग्राविमौ सृष्टौ यन्मे संपश्यतः सुखं पयोधरौ नातिचित्रं कस्य संजायते हृदि रागोपहतदेहोयमधरो यद्यपि स्फुटम् तथापि सेवमानस्य निर्वाणं संप्रयच्छति वहद्भिरपि कौटिल्यमलकैः सुखमर्प्यते दोषोपि गुणवद्भाति भूरिसौंदर्यमाश्रितः नेत्रयोर्भूषितावंता वाकर्णाभ्याशमागतौ कारणाद्भावचैतन्यं प्रवदंति हि तद्विदः कर्णयोर्भूषणे नेत्रे नेत्रयोः श्रवणाविमौ कुंडलांजनयोरत्र नावकाशोस्ति कश्चन न तद्युक्तं कटाक्षाणां यद्द्विधाकरणं हृदि तवसंबंधिनोयेऽत्र कथं ते दुःखभागिनः सर्वसुंदरतामेति विकारः प्राकृतैर्गुणैः वृद्धे क्षणशतानां तु दृष्टमेषा मया धनम् धात्रा कौशल्यसीमेयं रूपोत्पत्तौ सुदर्शिता करोत्येषा मनो नॄणां सस्नेहं कृतिविभ्रमैः एवं विमृशतस्तस्य तद्रूपापहृतत्विषः निरंतरोद्गतैश्छन्नमभवत्पुलकैर्वपुः तां वीक्ष्य नवहेमाभां पद्मपत्रायतेक्षणाम् देवानामथ यक्षाणां गंधर्वोरगरक्षसाम् नाना दृष्टा मया नार्यो नेदृशी रूपसंपदा ... गोपकन्यामसौ दृष्ट्वा गौरवर्णां महाद्युतिम् कमलामेव तां मेने पुंडरीकनिभेक्षणाम् तप्तकांचनसद्भित्ति सदृशा पीनवक्षसम् मत्तेभहस्तवृत्तोरुं रक्तोत्तुंग नखत्विषं तं दृष्ट्वाऽमन्यतात्मानं सापि मन्मनथचरम् तत्प्राप्तिहेतु क धिया गतचित्तेव लक्ष्यते प्रभुत्वमात्मनो दाने गोपकन्याप्यमन्यत यद्येष मां सुरूपत्वादिच्छत्यादातुमाग्रहात् नास्ति सीमंतिनी काचिन्मत्तो धन्यतरा भुवि अनेनाहं समानीता यच्चक्षुर्गोचरं गता अस्य त्यागे भवेन्मृत्युरत्यागे जीवितं सुखम् भवेयमपमानाच्च धिग्रूपा दुःखदायिनी दृश्यते चक्षुषानेन यापि योषित्प्रसादतः सापि धन्या न संदेहः किं पुनर्यां परिष्वजेत् जगद्रूपमशेषं हि पृथक्संचारमाश्रितम् लावण्यं तदिहैकस्थं दर्शितं विश्वयोनिना अस्योपमा स्मरः साध्वी मन्मथस्य त्विषोपमा ... कुचयोर्मणिशोभायै शुद्धाम्बुज समद्युतिः मुखमस्य प्रपश्यंत्या मनो मे ध्यानमागतम् अस्यांगस्पर्शसंयोगान्न चेत्त्वं बहु मन्यसे स्पृशन्नटसि तर्हि न त्वं शरीरं वितथं परम् अथवास्य न दोषोस्ति यदृच्छाचारको ह्यसि मुषितः स्मर नूनं त्वं संरक्ष स्वां प्रियां रतिम् त्वत्तोपि दृश्यते येन रूपेणायं स्मराधिकः ममानेन मनोरत्न सर्वस्वं च हृतं दृढम् शोभा या दृश्यते वक्त्रे सा कुतः शशलक्ष्मणि नोपमा सकलं कस्य निष्कलंकेन शस्यते समानभावतां याति पंकजं नास्य नेत्रयोः कोपमा जलशंखेन प्राप्ता श्रवणशंङ्खयोः विद्रुमोप्यधरस्यास्य लभते नोपमां ध्रुवम् आत्मस्थममृतं ह्येष संस्रवंश्चेष्टते ध्रुवम् यदि किंचिच्छुभं कर्म जन्मांतरशतैः कृतम् तत्प्रसादात्पुनर्भर्ता भवत्वेष ममेप्सितः

Saturday, February 9, 2019

वसन्‍त पञ्चमी : पावका न: सरस्वती वाजेभि: वाजिनीवती

कर, कार्य, कर्म आदि के मूल में कर, आप के अपने हाथ हैं। कर्म और श्रम की महत्ता प्रात:काल उठते ही स्वयं के हाथ देख उनमें लक्ष्मी और सरस्वती के साथ गोविन्द के दर्शन के निर्देश द्वारा बतायी गयी। 
कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्द: प्रभाते करदर्शनम्॥ 
दर्शन का क्रम जो भी हो, गति की दिशा स्पष्ट है। कर्म के मूल में गोविन्द रहें, सुकर्म स्वत: सुनिश्चित। 'गो' का एक अर्थ इन्द्रिय भी है। पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मिल कर कर्मी 'इन्द्र' को पराक्रमी बनाती हैं। आगे लक्ष्मी की प्राप्ति से पहले मध्य की सरस्वती विद्या आवश्यक हैं कि उत्कृष्टता, परिमार्जन और शुचिता बने रहें। इन सबके साथ से हर कर्म यज्ञ हो जाता है।
पावका न: सरस्वती वाजेभि: वाजिनीवती यज्ञम् वष्टु धियावसुः
चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम् यज्ञम् दधे सरस्वती
महो अर्ण: सरस्वती प्र चेतयति केतुना धियो विश्वा वि राजति। 
- ऋग्वेद
(देवी सरस्वती जो पवित्र करने वाली हैं, पोषण करने वाली हैं और जो बुद्धि से किए गए कर्म को धन प्रदान करती हैं। हमारे यज्ञ को सफल बनाएँ। जो सच बोलने की प्रेरणा देती हैं और अच्छे लोगों को सुमति प्रदान करने वाली हैं। जो नदी के जल के रूप में प्रवाहित होकर हमें जल प्रदान करती हैं और अच्छे कर्म करने वालों की बुद्धि को प्रखर बनाती हैं। वह देवी सरस्वती हमारे यज्ञ को सफल बनायें।)
बसंत पञ्चमी पर्व की मंगल कामनायें। सरस विद्या आप के पराक्रम और लब्धि में संतुलन सहायिका बनी रहे।

Null Set




अध्यापक - Null set का उदाहरण दो। 
छात्र - ऐसे #मुसलमानों का सेट जो बिना कोई जघन्य अपराध किये कब्र तक पहुँच गये हों!