Thursday, April 11, 2019

सब कुछ लील कर भी न अघाने वाला काला छेद


काले छेद से कुछ नहीं बचता। काला छेद समय तक खा जाता है। आधी शताब्दी खा गया! काले छेद द्वारा ये ये लील लिये गये:
(1) चेतना कि हमें भी विकसित होना है।
(2) परम्परा, इतिहास, माटी से प्रेम, शत्रु मित्र के अभिज्ञान की क्षमता, उद्योगधर्मिता, शील, सदाचार, नवोन्मेषी मेधा। 
(3) दिन प्रतिदिन बहते स्वेद एवं रक्त के फल।
(4) स्वाभिमान, संगठन, सम्यक बोध

काला छेद अपने जैसे लघु विवर भी जनता रहा जो उससे जो भी बचा खुचा था, लील गये। ऐसा नहीं था कि काले छेद की वास्तविकता से सभी अपरिचित रहे। सैद्धान्तिक रूप से उसकी वास्तविक चरित्र को कितनों ने उजागर किया किन्‍तु काले छेद का सम्मोहन ऐसा था कि लोग अबूझ बने रहे। सम्मोहन निकटता का था। काले छेद के निकट होते ही सबसे पहले भला बुरा समझने की चेतना लुप्त हो जाती है। वस्तुत: जो जो वह लीलता है, वही उसके बने रहने के कारक हैं। लोग उसके निकट न जायें, आहार न प्रदान करें तो काला छेद अन्तर्विस्फोट से समाप्त हो जाये।
काला छेद अमरबेल की भाँतो जन जन की शक्ति चूस कर समृद्ध होता रहा। उसके कारण एक नयी तिरस्कारी अवधारणा का जन्म हुआ - 'हिंदू विकास दर'।
पाँच वर्ष पूर्व काले छेद के रहस्य से यवनिका हटनी प्रारम्भ हुई तथा उस काल का अंत होने तक काले छेद की वास्तविक छवि सबके समक्ष थी। जो केवल सैद्धान्तिक था, अनेक जन की समझ से बाहर था, उसका रूप इस प्रकार सामने रख दिया गया, मानों चित्र हो।
जी हाँ, वह काला छेद भारत का राजनीतिक दल 'कांग्रेस' है। गत पाँच वर्षों में इस राष्ट्र के चहुँमुखी विकास ने दिखा दिया है कि आधी शताब्दी तक कांग्रेस ने कितना कुछ लील लिया! पाँच वर्षों के प्रकाशित वलय ने कांग्रेस रूपी काले छेद का रूप सबके समक्ष रख दिया।
इस काले छेद के निकट न जायें, लील लिये जायेंगे। इसकी मृत्यु केवल इसके द्वारा ही हो सकती है, इसे अपनी मृत्यु मरने दें।
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आप आगे के पाँच वर्षों के लिये सरकार चुनने जा रहे हैं। कांग्रेस रूपी काले छेद की वास्तविकता को जान कर अपने हित उसके विनाश हेतु मतदान करें। यह मात्र संयोग नहीं है कि सुदूर ब्रह्माण्ड में, अंतरिक्ष में स्थित एक ऐसे काले छेद का वास्तविक चित्र पहली बार वैज्ञानिक सामने ला पाये हैं जिससे कि द्रव्य तो द्रव्य, प्रकाश तक नहीं बच पाता।
लोकसभा चुनावों के इस कालखण्ड में अंतरिक्षीय काले छेद का वास्तविक चित्र पहली बार बनाया जाना नियति का संदेश है कि मतदान सोच समझ कर करें, अपना एवं देश का भाग्य चमकाने के लिये करें, अपनी मृत्यु मरते भारत के काले छेद कांग्रेस को क्रूर नियति के हाथों सौंप दें। कांग्रेस का नेतृत्त्व न केवल मानसिक रूप से विपन्न है वरन भ्रष्ट एवं निर्लज्ज भी है। निर्णय आप का, देश आप का, भाग्य आप का।    

Sunday, April 7, 2019

नवसम्वत्सर की जन्मकुण्डली पर कुछ यूँ ही


दिक्काल, मनुष्य एवं सकल जीव जाने कितने उलझे अन्योन्याश्रित तंतुओं से सम्बद्ध हैं। सोचता हूँ कि क्या ऐसी कोई विद्या हो सकती है जो किसी निश्चित कालखण्ड के बारे में ऐसी भविष्यवाणी कर दे जो सब पर लगे?

क्या किसी राष्ट्र की 'जन्मकुण्डली' बनाई जा सकती है? वह भी भारत जैसे देश की?

कल ऐसे ही नवसंवत्सर के बारे में ढूँढ़ता भ्रमण कर रहा था, अनेक स्थानों पर इस वर्ष को बहुत बुरा बताया गया था। उत्सुकता वश २०७५ आरम्भ के समय की भविष्यवाणियों को देखा, वे भी कुछ अच्छी नहीं थीं। मैं सोचने लगा कि क्या सच में विगत वर्ष भारतीय जन हेतु कुल मिला कर बुरा रहा?
यह पता नहीं कि ये भविष्यवाणियाँ सम्पूर्ण विश्व की जनसंख्या हेतु होती हैं या केवल भारत देश की। यदि मानें कि केवल भारत हेतु होती हैं, और ऐसा मानने के कारण भी हैं - चतुर्युग केवल भारत भूमि पर होते हैं, ऐसा पुराण कथन उपलब्ध है - तो भी सवा अरब से भी अधिक जनसंख्या पर आगामी ३६५.२५ दिनों का सकल समेकित प्रभाव बुरा ही होगा, ऐसा कैसे कहा जा सकता है?
किसी भी विद्या की सीमायें होती ही हैं, उनसे परे दूसरी विद्याओं का क्षेत्र हो जाता है। योजनाबद्ध ढंग से संधान हो, उद्योग हो तो क्या किसी जनसमूह का कल्याण या विनाश नहीं किया जा सकता? 

समृद्धि पूर्व के सिंगापुर हेतु क्या ऐसी भविष्यवाणियाँ की गयी थीं?

परमाणु बम एवं उसके पश्चात के उठ खड़े हुये जापान की?

दो दो विश्वयुद्धों से प्राय: ध्वस्त हो चुके एवं आगे समृद्ध यूरोप की?

जर्मनी के विभाजन की?

नाजियों द्वारा यहूदियों के व्यापक नरसंहार की? आगे इजराइल के निर्माण की?

अभी चल रहे यजिदियों के विनाश की?

कश्मीरी हिंदुओं के पलायन की?

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जाने कितने प्रश्न हैं। स्थूल एवं सूक्ष्म की बातें होती रहेंगी किंतु अनेक ऐसे प्रश्न किये जा सकते हैं कि उन घटनाओं की जिनके कारण मानवता बहुत गहराई से प्रभावित हुई या हो रही है, क्या भविष्यवाणियाँ की गयी थीं?
विद्या के प्रयोग से कौतुक हो या उसे जाँचने के कर्म, विशाल जनमानस को आगत समय के बुरे या अच्छे होने की बता उसके अवचेतन/अचेतन को पूरे वर्ष हेतु प्रभावित कर देने का क्या औचित्य है?
जब ऐसे प्रश्न उठते हैं तो अतिवादी प्रतिक्रियायें होती हैं, एक होती है ज्योतिष विद्या एवं ज्योतिषियों को बुरा भला कहने की, उन्हें कोसने की तथा दूसरी होती है समस्त को उचित बताने की, एक बहुत परिष्कृत विद्या की बहुत परिष्कृत निष्पत्तियों के रूप में प्रस्तुत करने की। भारत में शास्त्रों की न्यूनता आज भी नहीं है, पढ़ने वाले भले न हों; शास्त्रीय औचित्त्य दर्शाना असम्भव नहीं।
अन्य विद्याओं की भाँति ही मार्ग दो अतियों के बीच में है। उस पर चर्चा होनी चाहिये तथा इस पर कि तुलनात्मक रूप से आज जो सफल एवं सुखी देश हैं, उनमें फलित ज्योतिष की कितनी मान्यता है? जनता में कितनी पैठ है? क्या फलित ज्योतिष को नवसंस्कार की आवश्यकता है? वैसे ही जैसे कभी आर्यभट ने गणित का क्या किया था?
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लेख लम्बा था, प्रकाशित करते ही लुप्त हो गया, दुबारा लिखा गया है किंतु वह बात नहीं रही। इसका भी कोई फलित ज्योतिषीय पक्ष हो सकता है :)
किसी भी व्यक्ति पर या विद्या पर या व्यवसाय पर आक्षेप न करें। ज्योतिष उत्कृष्ट विद्या है, गणित एवं फलित पक्ष यिन-यान की भाँति ही एक दूसरे से जुड़े हैं।

इसके अध्ययन अध्यापन का या कहें कि विद्या का ही, वैश्विक स्तर पर, रूप ऐसा ही रहा है। उच्च गणित को आप विविध यवन अक्षरों एवं अन्य चिह्नों के प्रयोग के कारण गाली नहीं दे सकते, इस कारण भी नहीं कि एक अंक के ऊपर दूसरा अंक कैसे चढ़ा दिया जाता है!

Saturday, April 6, 2019

अन्‍धेर नगरी से


भारतेन्‍दु हरिश्चन्‍द्र कृत नाटक 'अन्‍धेर नगरी' से -

छेदश्चन्दनचूतचम्पकवने रक्षाकरीरद्रुमे,
हिंसाहंसमयूरकोकिलकुले काकेषुलीलारतिः । 
मातङ्गेनखरक्रयः समतुलाकर्पूरकार्पासियो:,
एषा यत्र विचारणा गुणिगणे देशाय तस्मै नमः ॥
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सेत सेत सब एक से, जहाँ कपूर कपास।
ऐसे देस कुदेस में कबहुँ न कीजै बास ॥
कोकिला बायस एक सम, पंडित मूरख एक।
इन्द्रायन दाड़िम विषय, जहाँ न नेकु विवेकु ॥
बसिए ऐसे देस नहिं, कनक वृष्टि जो होय।
रहिए तो दुख पाइये, प्रान दीजिए रोय ॥


Sunday, March 24, 2019

Murder by Mali Muslims

मुसलमानों का जिहाद अपना काम मौन रह कर सधे ढंग से कर रहा है। गर्भवती स्त्रियों, बच्चों सहित माली में 100 से ऊपर लोग मार दिये गये हैं। शुतुर्मुर्ग वैश्विक मीडिया में कहीं भी कोई रव नहीं है, सारे मानवाधिकारी मौन हैं क्योंकि इससे इस्लाम का वास्तविक रूप पुन: सिद्ध होगा। 
न्यूजीलैण्ड की घटना एवं कथित इस्लामोफोबिया प्रचार से मानसिक रूप से कुंद सभ्य संसार मौन है। 
माली नहीं जानते? माली अफ्रीका के सबसे सभ्य क्षेत्रों में एक है जहाँ टिम्बकटू है। टिम्बकटू के समृद्ध विद्वत इतिहास को जानना हो तो timbuktu manuscripts लिख कर गुगल अनुसंधान करें। 
विडम्बना ही है कि जिस इस्लामी सम्पर्क से टिम्बकटू की बौद्धिक समृद्धि मध्यकाल में शिखर पर पहुँच गयी, वही इस्लाम वहाँ की सात लाख पाण्डुलिपियों का शत्रु हो गया जिन्हें जाने कैसे कैसे यत्न कर बचाया गया। 
टिम्बकटू इस तथ्य का प्रमाण है कि इस्लाम के रहते सभ्यता एवं संस्कृति सुरक्षित नहीं हैं, भले ही उनको कभी इस्लाम ने ही न समृद्ध किया हो। मात्र 50000 की जनसंख्या वाला टिम्बकटू सांस्कृतिक, मजहबी एवं राजनीतिक शोध के लिये बहुत ही उपयुक्त नगर है। माली देश की स्थिति यह है कि संयुक्त राष्ट्र एवं पश्चिमी सैन्य उपस्थिति के रहते हुये भी वहाँ जिहादी हिंसा रुक नहीं रही। 
क्या आप सिंध से उठाई गयी हिंदू लड़कियों, कश्मीर में आतंक, भारत की किसी भी जामा मस्जिद के निकटवर्ती क्षेत्रों में व्याप्त सामान्य भय एवं गुण्डागर्दी, माली की हिंसा, यूरोप में 51 बच्चों से भरी बस को आग लगा कर नष्ट कर देने के प्रयास एवं ऐसे जाने कितनी ही वैश्विक समस्याओं एवं घटित में एक सार्व तत्व देख पा रहे हैं? देख पा रहे हैं कि ये सभी नाभिनालबद्ध हैंं? क्या उसे स्पष्ट रूप से आप कह सकते हैं? 
मस्तिष्क को विस्तार दें तथा वाणी को कष्ट, खुल कर कहें कि वह सार्व तत्त्व इस्लाम है तथा उसके जिहाद में लिप्त सभी योद्धा मुसलमान हैं।
... 
https://www.jihadwatch.org/2019/03/mali-muslims-murder-over-100-people-including-pregnant-women-and-small-children-in-jihad-assaults-on-two-villages

Need for Disaster Management Plan for hazardislam


संकटसम्भावी संस्थानों एवं उद्योग अधिष्ठापनों में जहाँ कि विकिरण सम्बंधी, रासायनिक या विस्फोटक दुर्घटनाओं से जीव एवं सम्पत्ति नाश की प्रायिकता बहुत अधिक होती है, बहुत ही विधि विधान से दुर्घटना कारकों की विनाशक क्षमता के अनुसार उनका वर्गीकरण किया जाता है। मारकता एवं तीव्रता के अनुसार उनको विविध रंग कूट दिये जाते हैं तथा जहाँ वे होते हैं, उसे केंद्र मान कर उनके प्रभाव की भौगोलिक दूरी की त्रिज्या ले कर वृत्त खींचे जाते हैं। चूँकि दूरी के अनुसार मारकता घटती जाती है, एक वृत्त के भीतर भी विविध संकेंद्रीय क्षेत्र होते हैं।
इनके अनुसार ही दुर्घटना की स्थिति में लोगों को वहाँ से दूर ले जाने की प्राथमिकता एवं उपाय युक्तियाँ निर्धारित की जाती हैं। कर्मचारी गण एवं निकटस्थ लोग सावधान रहें तथा सतर्क रहें, इस हेतु छ्द्म दुर्घटना का नाट्य रूपांतरण कर बचाव के सारे उपाय एवं युक्तियाँ इस प्रकार से लगाई जाती हैं मानों वास्तव में दुर्घटना हुई हो। ऐसे नाट्य रूपांतरणों की एक मानक प्रक्रिया एवं अनिवार्य आवृत्ति पारिभाषित होती है तथा दुर्घटना की स्थिति में प्रत्येक कर्मचारी को पहले से ही यह ज्ञात रहता है कि उसकी क्या भूमिका होगा, वह किस बचाव समूह का अंग होगा, आदि इत्यादि। समेकित रूप से इसे आपदा प्रबंधन योजना disaster management plan कहा जाता है। 
गत दिनों एक सज्जन से बात हो रही थी। उन्होंने सुरक्षा से सम्बंधित एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात कही - भारत में समस्त मस्जिदों, दरगाहों एवं चर्च गिरजाघरों का मानचित्रीकरण होना चाहिये, देशांतर एवं अक्षांश के साथ।
मेरे मन में आया कि यदि इसके पश्चात उनकी मारक क्षमताओं के अनुसार मानचित्र पर दुर्घटना प्रभाव क्षेत्र अंकित किये जायें तथा सबसे अधिक घातक प्रभाव लाल रंग से दर्शाया जाय तो पूरा भारत ही 'रक्तरञ्जित' दिखेगा। सहसा ही मुझे मुसलमानों द्वारा विभाजन पूर्व सीधी कार्रवाई दिवस Direct Action Day का स्मरण हो आया तथा यह भी कि यदि आज ऐसा हो तो क्या हमारे पास कोई बचाव योजना है? कोई मानक प्रक्रिया? छ्द्म दुर्घटना आयोजन कर के बचाव उपायों की जाँच करने की कोई आवृत्ति? जापान भूकम्पों हेतु ऐसा करता है।
क्या समस्त सभ्य संसार को इस्लाम हेतु भी ऐसे उपाय नहीं कर लेने चाहिये। वैश्विक स्तर पर जो चल रहा है, उसमें तो यह काम तत्काल किया जाना चाहिये।
मुझे इसका भी भान हो गया कि देवबंद, बरेली आदि ऐसे घातक अधिष्ठापनों में आयेंगे जिनका प्रभाव वृत भारत की सीमाओं से बाहर तक जायेगा ! भारत अंतर्राष्ट्रीय आतंकियों का पालना बना हुआ है। यदि आप को स्वयं देखना हो तो तथा आप किसी ऐसे नगर के निवासी हैं जहाँ मुसलमान जनसंख्या पाँच प्रतिशत भी है किंतु विभिन्न वार्डों में घनीभूत है तो नगर मानचित्र ले कर उसका दुर्घटना मानचित्र बनायें। आप को समझ में आ जायेगा कि मस्जिदें बहुत सोच समझ कर, सामरिकता का ध्यान रखते हुये बनाई गई हैं। साथ ही यह भी कि घिर जाने की स्थिति में वहाँ के अन्य मतावलम्बियों हेतु सिवाय कट जाने के कोई अन्य उपाय नहीं है।
बहुत दिनों से विकिपीडिया की भाँति ही मुसलमानी एवं इसाई अपराधों के एक आँकड़ा एकत्रीकरण जालतंत्र बनाने पर विचार कर रहा हूँ जिनका भौगोलिक मानचित्रीकरण भी उपलब्ध हो। आरम्भ में लगा कि हो जायेगा किंतु अब लग रहा है कि यह एक पूर्णकालिक एवं धनाग्रही काम होगा। चाहे उक्त सज्जन की योजना हो या मेरी, हमारे पास विचार तो हैं किंतु संसाधन नहीं हैं। जिनके पास संसाधन हैं, उनके पास विचार नहीं हैं । इन दो वर्गों का अलगाव वैश्विक स्तर पर बना हुआ है तथा इस्लाम का जिहाद इसी अलगाव के कारण फल फूल रहा है।
इस्लाम में कोई सुधार नहीं हो सकता क्यों कि क्रूरान में नहीं हो सकता तथा वह मजहबी किताब एक ही है जिसका उसके लेखक की शिक्षाओं के साथ पालन करना प्रत्येक मुसलमान का मजहबी कर्तव्य है। मनुष्यों को मुसलमानों से इस कारण ही संकट है कि किताब में समस्त मनुष्यों को या तो मुसलमान बना देना निर्दिष्ट है या उनका विनाश कर देना तथा मुसलमानों में ऐसे सदैव रहेंगे तथा उन्हें अन्य मुसलमान जकात के माध्यम से आवश्यक संसाधन भी उपलब्ध कराते रहेंगे, जो मनुष्यों के विनाश हेतु आत्महत्या करने को सदैव तत्पर रहेंगे। दुहरा दूँ कि समय रहते इस्लाम से बचाव के सक्रिय उपाय पूरे विश्व को उसी भाँति कर लेने चाहिये जिस भाँति नाभिकीय संस्थानों, विकिरण संस्थापनों, घातक रासायनिक संयंत्रों आदि हेतु किया जाता है। सीधी कार्रवाई के आह्वान पर किस दिन कहाँ 'यूनियन कार्बाइड' हो जाये, ज्ञात नहीं।
... हाँ, आप ने ठीक पढ़ा है, मैंने मुसलमानों को मनुष्यों की श्रेणी में नहीं गिना है। वे तो पशु श्रेणी में भी नहीं रखे जा सकते! कारण इस्लाम, क्रूरान एवं उसके लेखक हैं।