Tuesday, August 25, 2020

वर्ष कैसे? नक्षत्र, राशियाँ आदि कैसे और क्यों?


किशोरों हेतु। बालकों एवं किशोरों के लिये लिखना संसार का सबसे कठिन काम है। वही अच्छे से कर पाते हैं जो या तो मन से बड़े सरल होते हैं या बड़े ही घाघ। मेरे जैसे साधारण व्यक्ति हेतु यह कठिन काम है, तब भी प्रयास करता हूँ।
देखो, मनुष्य की मेधा जब विकसित हो गई तो वह देह व परिवेश पर विविध प्रभाव डालने वाली ऋतुओं के आने जाने के निश्चित क्रम व समय पर दुहराव पर ध्यान देने लगा। सबसे स्पष्ट ऋतु थी वर्षा जब तपते आकाश से पानी झमाझम बरसने लगता।
उसने पाया कि ऊपर आकाश में दो पिण्ड ऐसे हैं जिनसे ऋतुओं के आने जाने का गणित जाना जा सकता है, दिन में सूर्य तो रात में चंद्रमा। चंद्रमा घटता बढ़ता तो उसके एक पूरे गोले से दूसरे गोले तक होने में पता चला कि २९ से ३० के बीच सूर्योदय होते हैं। ऐसे १२-१३ बार होने पर वर्षा ऋतु पुन: आ जाती। इन कुल ३५४ दिनों को क्या नाम दें? बरखा रानी पर ही रख दें? नाम रखा गया - वर्ष ।
मनुष्य की मानसिक क्षमता बढ़ती गयी तो आगे उसे यह भी लगा कि १२ - १३ पूर्णिमा से अच्छा गणित तो उस समय में है कि जब ऋतु सुखदायी हो, चारो ओर फूल खिल रहे हों, नई पत्तियाँ हों। तब तक मनुष्य वस्त्र पहनने लगा था। उसे लगा कि उस विशेष ऋतु में पेड़ पौधे भी पुराने वस्त्र उतार कर नये पहन लेते हैं। उसका नाम रखा गया - वसंत। उस समय ऐसा भी होता कि एक विशेष दिन अन्य दिनों की तुलना में सूरज इधर उधर का झुकाव तज ठीक नाक की सीध में उगता। उस दिन रात और उजाले के समय भी सम होते। ऐसा वर्ष में दो बार होता किंतु विशेष ऋतु वसंत और इस विशेष स्थिति का यह योग लगभग ३६६ दिनों में आता। उसने इसे नाम दिया - विषुव, वसन्त विषुव ।
तब तक किसी भारतवासी को यह भी पता लग चुका था कि विशेष प्रभाव वाली ऋतुयें ६ होती हैं। गणना की क्षमता बढ़ ही चुकी थी तो ३५४ और ३६६ का औसत निकाला गया ३६०। यह संख्या जादू वाली थी। ३० से बँट जाती, ६ से बँट जाती, १२ से भी बँट जाती। ३० तो चंद्रमा से ही पता चला था, उसे नाम दिया चंद्रमास या मास। १२ - १३ के लगभग से ठीक ठीक १२ का सूर्य से ही पता चला था तो ३०-३० के १२ आदित्य बने जोकि सूर्य का भी नाम है। बड़ी अच्छी बात थी कि १२x३० = ३६०। तीस तीस के बारह आदित्य बारह मास के नाम हो गये। सूर्यनमस्कार में हैं न बारह नाम!
तब तक मनुष्य आकाश निहारने की कला में प्रवीण हो चुका था। उसने पाया कि चंद्रमा के रात का पथ दिन में सूर्य के पथ के लगभग साथ ही होता है। यह भी पाया कि जो तारे थे, वे सब मिल कर भिन्न भिन्न आकार बनाते थे तथा वे आकार कभी परिवर्तित नहीं होते थे अर्थात सूर्य चंद्र की तुलना में तारे स्थिर थे। उसने आकारों को नाम दे दिये जैसे सूँड़ जैसी आकार वाली आकृति इंद्र देवता की सवारी हाथी ऐरावत हो गयी। कुछ ने उसमें बिच्छू देख लिया, कहीं भालू मिल गया तो कहीं राजा का सिंहासन।
चंदा भी बड़ा चञ्चल था। गोले से घटते घटते एक समय जाने कहाँ चला जाता और अगले ही दिन से पुन: थोड़ा थोड़ा बढ़ते हुये दिखने लगा। एक पूरे से एक विलोपन तक का समय मास का आधा था जिसे नाम दिया गया पक्ष। एक वर्ष में हो गये २४ पक्ष।
आकाश को आज के कैलेण्डर की भाँति प्रयोग किया जाने लगा। चंद्र के पथ को २४ भागों में बाँट कर विशेष तारों के नाम पर उनके नाम रख दिये गये। बताने में सुविधा हो गयी कि चंद्र अमुक भाग में है आज तो कल दूसरे वाले में होगा।
किंतु एक बात और भी थी कि स्थिर व विशिष्ट तारों वाले किसी भाग विशेष पर चंद्र पुन: २७ से कुछ अधिक दिन में पहुँचता। अत: ठीक ठीक स्थिति बताने के लिये चौबिस में से तीन के दो दो भाग, पूर्व व उत्तर, कर कुल २४+३ = २७ भाग बना दिये गये। इन्हें नाम दिया गया नक्षत्र, नक्ष कहते हैं निकट आने को, ये भाग सूर्य व चंद्र के पथ के सदैव निकट थे, इनका कभी क्षरण नहीं होता था, इस कारण भी कहलाये नक्षत्र।
कुछ लोग इन ज्ञानियों से भी चतुर थे कि यदि २७ से कुछ अधिक दिन लगते हैं तो क्यों न एक अंश ले कर २८ भाग बना दिये जाँय! किंतु २८ पूरा तो होता नहीं था। उससे निपटने हेतु अंश की व्यवस्था की गयी।
गाय चार पाँवों पर खड़ी होती है। पाँव संस्कृत शब्द पाद से बना है। यह पाया गया कि नक्षत्र आधारित मास २७ पूरे दिनों से एक दिन के लगभग लगभग चौथाई भाग इतना अधिक होता है जिसे यह कहा गया कि अट्ठाइसवें नक्षत्र को चार में से केवल एक पाद का अर्थात चौथाई भोग ही मिले तथा उसकी हेठी न हो, इसलिये उसका सबसे अच्छा नाम रखा गया, सबसे शुभ - अभिजित, सदा विजयी।
परंतु काल भला मानव के बाँधने से बँध पाया कभी? वास्तव में कथित अभिजित का समय चौथाई दिन से थोड़ा अधिक होता था २७+(१/‌४)= २७.२५ न होकर २७.३। यही स्थिति अन्य की भी थी। वर्ष ३६५ या ३६६ न हो कर ३६५.२५ दिनों का होता, घटती बढ़ती कलाओं के सापेक्ष मास ३० का न हो कर २९.५ दिन में ही पूरा हो जाता।
इन सबके समाधान के लिये गणित की जटिल प्रक्रियायें बनाई गईं। रुचि हो तो और आगे की पढ़ाई में यह विषय ले लेना। अभी तो इसे ही ढंग से समझने का प्रयास करो।

Saturday, June 20, 2020

galwan valley conflict गलवान घाटी : सीमाओं पर योद्धा डटे हुये हैं!

galwan valley conflict
सर्वदलीय बैठक हो गई किंतु चीनी आक्रमण पर अभी भी भिन्न भिन्न बातें चल रही हैं। जैसा कि होता ही है, धैर्य व बुद्धिमत्ता तज उत्तर के हीनुओं से ले कर दक्षिण के प्रज्ञाशत्रु तमिळ तक समस्त टिकटाकिये चिम्पिये लगे हुये हैं। सरल शब्दों में समझते हैं: (1) जम्मू व काश्मीर को आधिकारिक रूप से दो भागों में बाँट कर गिलगित, बाल्टिस्तान व अक्षय चिन को नवनिर्मित लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश में सम्मिलित किया गया। इसके साथ ही चीन व पाकिस्तान से सम्बंधित विवादित क्षेत्रों का बहुत बड़ा भाग सीधे केंद्रीय शासन में आ गया। कथित कश्मीरियत का जो परोक्ष इस्लामी प्रभाव कूटनीतिक रूप से इस क्षेत्र पर था, वह एक झटके में 'बौद्ध' हो गया। इसे चीन व पाकिस्तान ने बहुत अच्छे से समझा। कश्मीर की विशेष स्थिति बनाये रखने के नेपथ्य में ऐसे जुड़े पक्ष भी थे जो एक झटके में स्वाहा हो गये। (2) इस लद्दाख के पश्चिमी क्षेत्र अक्षय चिन Aksai Chin को भारत आधिकारिक रूप से अपनी भूमि मानता है जो चीन के अवैध अधिकार में है। इसी प्रकार पूर्वी गिलगित व बाल्टिस्तान आदि को भारत आधिकारिक रूप से अपनी भूमि मानता है जो पाकिस्तान के अवैध अधिकार में हैं। (3) जो भूमि जिसके अधिकार में है, उस पर वह जो करना चाहे, करेगा। आप रोक नहीं सकते क्योंकि आप का अधिकार है ही नहीं! जिस प्रकार गिलगित व बाल्टिस्तान में चल रही परियोजनाओं को, चाहे सैन्य हों या असैन्य, आप नहीं रोक सकते, उसी प्रकार अक्षय चिन में भी नहीं रोक सकते। (4) चीन जो कुछ भी कर रहा है, अपने अधिकार क्षेत्र में कर रहा है, वास्तविक नियंत्रण रेखा LAC से लगे अपने भाग में कर रहा है जो कि आधिकारिक रूप से आप का है किंतु वास्तव में नहीं है। आप के घर पर कोई बलात स्थापित हो जाये तो कील ठोंके या बोरवेल बनवाये, आप कुछ नहीं कर सकते। वैसी ही स्थिति है। (5) जब प्रधानमंत्री ने कहा कि चीन हमारी भूमि पर नहीं प्रविष्ट हुआ है व हमारा कोई धाक उसके नियंत्रण में नहीं है तो इसका अर्थ है कि चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा से इधर नहीं आया है, अक्षय चिन में तो वह पहले से ही है। (6) अक्षय चिन हो या गिलगित बाल्टिस्तान, उनके निर्माण कार्य रोकने का एक ही मार्ग है - संधि द्वारा या आक्रमण कर भूमि पुन: ले ली जाय। उस स्थिति में वहाँ जो भी निर्माण कार्य हुये होंगे, हमारे होंगे। संधि से तो मिलने से रहे, युद्ध ही एकमात्र उपाय है। समझ गये? (7) हम क्या कर सकते हैं? हम अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में द्रुत गति से सामरिक व नागरिक निर्माण कार्य कर सकते हैं जोकि विगत छ: वर्षों से युद्ध स्तर पर चल रहे हैं, जिन पर विदूषकों के शासन काल में या तो नगण्य प्रगति हुई या सोचा तक नहीं गया! हम अपनी सैन्य मारक क्षमता बढ़ा सकते हैं। उस पर भी काम चल रहा है। हम LAC से आगे बढ़ने के उनके प्रत्येक प्रयास का मुँहतोड़ उत्तर दे सकते हैं जोकि किया जा रहा है। हम कूटनीतिक स्तर पर चीन व पाकिस्तान को घेरने के प्रयास कर सकते हैं। वह भी किया जा रहा है। यह बात और है कि यह बहुत ही मंद गति से बढ़ने वाला काम है जिसकी अनिश्चितता बहुत अधिक है। तिब्बत, हांगकांग जैसे उदाहरण आप के समक्ष हैं। कोई भी देश आपके लिये टैंक व शस्त्रास्त्र ले कर चीन या पाकिस्तान से नहीं भिंड़ेगा, इतना तो आप समझते ही होंगे। (8) राष्ट्रीय स्तर पर आधिकारिक स्पष्टीकरण के पश्चात भी यदि आप उन क्षेत्रों में निर्माण कार्य रुकवाना चाहते हैं जो चीन या पाकिस्तान के अधिकार में हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि आप चाहते हैं कि भारत चीन या पाकिस्तान पर आक्रमण करे। और कोई उपाय तो है नहीं। समस्या यह है कि आप स्पष्ट हैं ही नहीं या आप को मनोरञ्जन व रोमाञ्च का एक और अवसर मिल गया है या आप जानते ही नहीं कि आप चाहते क्या हैं? या जानते भी हैं तो यह नहीं जानते कि उसकी लब्धि कैसे होगी? उसके लिये निर्वाचित सरकार है, सेनायें हैं, विशेषज्ञ हैं; उन पर विश्वास कीजिये। विश्लेषण चलता रहे, टोका टोकी होती रहे, लोकतंत्र में आवश्यक हैं किंतु अपनी सीमाओं का ज्ञान होना भी आवश्यक है। यह बात और है कि चीन में लोकतंत्र है ही नहीं। वहाँ हान जाति का अधिनायकवाद है और आप के यहाँ 2700 से अधिक जातियाँ हैं, सबके अपने अपने परशु हैं, कोई किसी से उन्नीस नहीं और राम की किसी को पड़ी नहीं! इन बड़े ही मूलभूत अंतरों के मर्म आपकी बौद्धिक सीमा के बाहर हैंउसी काम तक सीमित रहें जो आप कर सकते हैं, बाइक उठाइये और वहाँ पहुँचिये जहाँ कोरोना काल से लड़ने हेतु मनरेगा में अतिरिक्त फण्ड आया है, पचास प्रतिशत तो आप का बनता ही है न! उसका त्याग न करें, सीमाओं पर योद्धा डटे हुये हैं!

Sunday, June 14, 2020

American White Guilt, भारत का भविष्य - वरेण्य क्या है?


https://www.facebook.com/vitaliy.dzyuba/videos/10217440508261655/ 

ऊपर का विडियो देखें, श्वेत महिला कालों के जूते चूम रही है! 
श्वेत अपराधबोध की परिणति यही होती है। संसार में जितना अत्याचार, लूट व विनाश दोनों अब्राहमिक पंथों ने किया, उतना किसी अन्य पन्थ ने नहीं। क्या कारण है कि इसाइयों में अपराधबोध घर कर गया जबकि मुसलमान अपने पैशाचिक कृत्यों पर गर्व करते हैं? इस विडियो में बाइबिल की भविष्यवाणी का संदर्भ दे कर काले अपने इस कर्म का औचित्य बता रहे हैं। सनातनियों में भी ऐसे बहुत मिलेंगे जो 'कलिकाल' के बारे में की गयी भविष्यवाणियों को सच मानते हैं तथा संकुचित हो, बच बचा कर जीने व बच्चे बड़े करने में विश्वास रखते हैं। उन्हें ले दे कर यही उपयुक्त मार्ग लगता है, अपने 'ठीक' से जी लें, भविष्य हेतु राम रचि राखा है है!   
मानव मनोविज्ञान बहुत ही जटिल होता है, विश्लेषण तो बहुत किया जा सकता है किन्तु आवश्यकता प्रक्रिया के विश्लेषण की नहीं, परिणति के विश्लेषण की है। परिणति ही प्रक्रिया के उचित मार्ग को सुनिश्चित करे। यहीं विवेकानंद प्रासङ्गिक हो जाते हैं, जो निर्भयता, पौरुष और क्षात्रभाव की बातें करते पूरे जीवन सक्रिय रहे। उन्होंने सूत्र रूप में बड़ी बात कही कि जो कुछ भी मनुष्य को निर्बल करे, क्लीव बनाये वह विष के समान त्याज्य है।
श्वेत अपराधबोध की जड़ उनकी उस विषैले शिक्षातंत्र में है जो political correctness और कथित मानवताबोध का आधार ले कर वास्तव में वाम-विष सूक्ष्म रूप से विद्यार्थियों के मन में inject करता है और ठीक यही भारत में भी हो रहा है। हमारी पीढ़ी अपने मूल से कटी व आत्मघृणा में पगी नयी पीढ़ी से साक्षात हो रही है। अगले बीस वर्षों में भारत में भी ऐसा दिखने लगे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।
शिक्षा ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है और दुर्भाग्य से हमारा पूरा शिक्षातंत्र विषैला है जिसके उपचार हेतु कुछ नहीं किया जा रहा, कुछ भी नहीं।
मुसलमान भी उसी शिक्षातंत्र से हैं किंतु हममें से अत्यल्प ने उनकी मजहबी शिक्षापद्धति की पकड़ उनके परिवारों पर देखी है। वैसे भी हमारा शिक्षातंत्र उन्हें पीड़ित व शोषित ही चित्रित करता है, जो उनके एजेण्डे के अनुकूल ही पडता है। दलहितैषी हों या मुसलमान, इस कारण ही मीम-भीम हो जाते हैं।
इसाई संसार में चर्च के प्रति दुराव व उपेक्षा बढ़ रहे हैं जिसकी क्षतिपूर्ति वे कथित १०/४० पट्टी की येन केन प्रकारेण, धूर्तता, कपट आदि के द्वारा मतांतरण से कर रहे हैं।

उत्तरी अक्षांश दस से चालिस के बीच की पट्टी को विश्व मानचित्र पर देखें, इसमें वह जनसंख्या निवास करती है जो हिंदू है, बौद्ध है, अनाब्रहमी है। चूँकि मतांतरण अभियान की धन आपूर्ति का सोता श्वेत अपराधबोध ग्रस्त क्षेत्रों से ही है, इनका मार्ग प्रत्यक्ष न हो कर अप्रत्यक्ष है और 'धीमे किंतु निश्चित' पर विश्वास करता है।
मुसलमानों का मार्ग भिन्न है - 'जनसंख्या उत्पादन' व 'इलाका जिहाद' का। चुपचाप जनसंख्या बढ़ाते हुये किसी भी क्षेत्र विशेष में सामान्य अपराधवृत्ति द्वारा बहुसंख्यकों में भय भरो जिससे वे पलायन को बाध्य हो जायें और इस प्रकार टुकड़ा टुकड़ा दीन की फतह होती रहे। कैराना, मेवात, आजमगढ़, दिल्ली, हैदराबाद, मुम्बई आदि के कुछ बड़े भाग ऐसे ही दारुल इस्लाम है जहाँ पुलिस क्या, सेना भी जाने से पूर्व बड़े उपाय करेगी। बिजली मीटर की रीडिंग नहीं ली जाती, जो बता दे मियाँ वही लिख लो और दफा हो। यही स्थिति जनगणना के समय होती है।
हम और हमारे आप के बच्चे क्या कर रहे हैं? सारे पंथ एक समान, धर्म अफीम है, सभी बुरे एक हैं जैसी मूर्खताओं को आँखें मूँदे चयनित रूप से लागू कर रहे हैं। कोई जगा हुआ कुछ कहता है या स्वर उठाता है या तो घर परिवार वाले ही चुप करा देते हैं या दीनियों द्वारा जिबह कर दिया जाता है, एक को मारो एक लाख आतंकित होंगे, भारतीय न्याय व्यवस्था  का क्या, तारीख पर तारीख के पश्चात अन्तत: छूट ही जाओगे, जिहाद का सवाब तो मिलना ही है।
ऐसे में - 
- अपने शास्त्रों का स्वयं अध्ययन करें तथा बच्चों को भी करवायें। उनमें भी ऐसा बहुत कुछ है जो अब अप्रासंगिक है, सार्वकालिक नहीं तथा जिसका महत्त्व अकादमिक अध्ययन के अतिरिक्त कुछ नहीं है, उसकी उपेक्षा करें। ऋषि मुनि मांसाहारी थे या नहीं, परशुराम ने २१ बार सभी क्षत्रियों का समूल नाश किया या ९९ बार, सबका किया या केवल अत्याचारियों का, ब्राह्मणों ने सबका शोषण किया जैसी गौण बातें आपके विमर्श के केंद्र में हैं। विश्लेषण ठीक है किंतु ज्वलंत व मुख्य समस्याओं से मुख मोड़ कर एक सीमा से आगे इन्हीं सब में रत रहना आत्मरति को जन्म देता है, भौंड़े ढंग से कहें तो हस्तमैथुन समान जिससे कुछ नहीं उपजना सिवाय क्षणिक मजे के! 
जातिवादी आग्रह व अन्य जो कलुष हैं यथा शाकाहारी होने पर स्वयं को धरा से ऊपर का देवता मानना तथा मांसाहारियों को पतित मानना, समस्या की विराटता से मुँह मोड़ कर व्यर्थ के वितण्डे में पड़ना, अपने आग्रहों हेतु तोड़ मरोड़ करना, झूठ व कपट का आश्रय लेना आदि इत्यादि से दूर रहें।
- सब पंथ एक समान; सानूँ की; धर्म अफीम है; स्त्रियाँ, कथित दलित व कथित अल्पसंख्यक आदि सभी बहुत पीड़ित प्रताड़ित हैं; हम श्रेष्ठ हैं क्योंकि विशेष रज-वीर्य से उपजे हैं; सभी अपनी अपनी जाति आधारित गोलबंदियों में लगे हैं, हम क्यों नहीं? हमें पाँच हजार वर्षों से दबा कर रखा गया आदि इत्यादि मूर्खतापूर्ण आग्रहों को त्याग दें और ढंग से सोचने का अभ्यास करें कि संकट है और आप न चाहते हुये भी युद्ध में हैं।
- सक्रिय प्रतिरोध हेतु (प्रतिक्रिया मात्र नहीं) लगें रहें तथा बच्चों व युवाओं को भी लगायें। प्रतिरोध आत्मघाती व मूर्खतापूर्ण आवेगी कर्म न हो कर, सुविचारित व दूरदृष्टि युक्त हों जिनसे तात्कालिक व दूरगामी सुरक्षा तो सुनिश्चित हो ही, उत्पातियों में भी स्थायी भय बना रहे।
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तस्मात् सर्वेषु कालेषु माम् अनुस्मर यथाशास्त्रम्। युध्य च युद्धं च स्वधर्मं कुरु। मयि वासुदेवे अर्पिते मनोबुद्धी यस्य तव स त्वं मयि अर्पितमनोबुद्धिः सन् मामेव यथास्मृतम् एष्यसि आगमिष्यसि असंशयः न संशयः अत्र विद्यते॥ 
॥ जय श्रीराम, जय योगेश, जय योगीश ॥
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Sunday, May 26, 2019

हिंदुत्व हेतु मोदी से बहुत आशा न रखें


हिंदुत्व हेतु मोदी से बहुत आशा न रखें, हिंदुत्व का हित हिंदुओं से होगा, सरकार से नहीं। मोदी सरकार इतना ही कर सकती है कि उनके उद्योग के आड़े न आये। आप ने उसे चुना जो उपलब्ध विकल्पों में सर्वोत्तम था किंतु वह आप के लिये पूर्णत: मनोनुकूल हो, आवश्यक नहीं।
उपलब्ध विकल्पों में मोदी का ही सर्वोत्तम होना आप की सीमा को दर्शाता है। हिंदुओं में धर्म, देश एवं अपनी नृजाति को ले कर उपेक्षा एवं उदासीनता बहुत है। स्थिति इतनी बुरी है, इतनी कि मोदी में ही आप अपनी समस्त आशाओं को देख पाने को अभिशप्त हैं जबकि मोदी जिस संगठन से आते हैं उसकी स्थापनायें बहुत स्पष्ट हैं तथा वह 'हिंदू' से ऊपर 'राष्ट्र' को रखता है, 'हिंदू' और 'राष्ट्र' में भेद भी। सोच में यह मौलिक अंतर बहुत महत्त्वपूर्ण है।
यह दुर्भाग्य ही है कि संघ के अतिरिक्त देश में हिंदुओं का ऐसा कोई संगठन नहीं है जो समांतर प्राथमिकतायें रखते हुये मोदी वाले 'संक्रमण दशक' से आगे स्पष्ट 'हिंदू राष्ट्र शताब्दी' पर केंद्रित हो।
हाँ, एक बात और, विकास एवं हिंदू राष्ट्र में कोई वैर नहीं। दोंनों परस्पर अपवर्जी एवं समांतर बातें हैं। निराश होने की आवश्यकता नहीं है. अपने स्तर पर हिंदू हित आप से जो भी हो सकता हो, व्यापक परिदृश्य एवं हितों पर केंद्रित रहते हुये करें। जैसे मोदी आये हैं, वैसे ही वह भी आयेगा जो हमें संक्रमण से मुक्त करेगा।

Sunday, May 19, 2019

असंशयविनाशात्‍संशयविनाश: श्रेयान्

नास्त्यनन्‍तराय: कालविक्षेपे। असंशयविनाशात्‍संशयविनाश: श्रेयान् ।
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(1) मतांतरण conversion राष्ट्रीय स्तर पर अवैध घोषित हो। 
(2) साम्प्रदायिक अल्पसंख्यक होने के लिये जनसंख्या प्रतिशत अधिकतम 5% तक निश्चित किया जाय। अल्पसंख्यक राज्य स्तर पर पारिभाषित हों। 
(3) नये धर्मस्थलों, कब्रस्थलों, मदरसों एवं पंथीय विद्यालयों के निर्माण नियमन हेतु एक राष्ट्रीय संस्था हो। 
(4) मंदिरों के प्रबंधन से सरकार हटे तथा सम्बंधित पुजारी एवं संरक्षकों के न्यास उनका प्रबंधन करें। 
(5) शिक्षा में बारहवीं तक केवल केंद्रीय पाठ्य पुस्तकें मान्य हों। मानविकी की एन सी आर टी की समस्त पुस्तकों को कूड़े में फेंक नया अ-वामकृत पाठ्यक्रम लागू हो। 
(6) पाठ्यक्रम परिवर्तन कर शिक्षा को अर्थकरी बनाया जाय। विद्यार्थियों का एक राष्ट्रीय डाटा बेस हो। 
(7) बी ए से ले कर एम बी ए तक, डिप्लोमा से ले कर इंजीनियरिंग तक पढ़े लिखों व्यर्थ के युवाओं की भीड़ न हो इस हेतु उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु चयन की एक कठिन मानक प्रक्रिया हो। जाने कितने करोड़ युवा मानव वर्ष भटकते युवाओं द्वारा रोटी के स्रोत के संधान में व्यर्थ हो जाते हैं। 
(8) छात्रसंघ चुनावों पर स्थायी प्रतिबंध हो।
(9) विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के आचार्यों का नियोजन स्थायी न हो कर समीक्षणीय हो - कितने अकादमिक पत्र छपे? अन्य क्या योगदान किये? विद्यार्थियों की गुणवत्ता में कितना सुधार हुआ आदि के निर्धारण हेतु तन्त्र हो। 
(10) उच्च शिक्षा पर छूट समाप्त हो। उद्योग एवं अन्य समृद्ध संस्थानों द्वारा केवल प्रतिभाशाली एवं योग्य छात्रों हेतु वृत्ति की व्यवस्था अनिवार्य की जाय। 
(11) अभियांत्रिकी शिक्षा में पाणिनीय व्याकरण अनिवार्य किया जाय। आरम्भ हाई स्कूल से ही हो जाय। 
(12) संविधान की भूमिका से पन्थनिरपेक्ष एवं समाजवाद शब्द हटा दिये जाँय। 
(13) न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु संविधान संशोधन कर नवीं अनुसूची में प्रक्रिया को सम्मिलित किया जाय। सभी रिक्त स्थान भरे जायँ तथा निर्णयों की समयसीमा निश्चित की जाय। वर्तमान का चाचा-भतीजा-यौनतुष्टि तंत्र समाप्त किया जाय।
(14) समान नागरिक संहिता लागू हो। 
(15) अयोध्या में श्रीराम का भव्य  मंदिर उनके जन्मस्‍थान पर बिना किसी क्रूरान या अजान के अस्तित्व के बने।    
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मैं लिखता चला जा सकता हूँ। प्रथमदृष्टया असम्भव प्रतीत होती इन बातों के बिना भारत का कल्याण नहीं होना। आने वाली सरकार किसी की भी हो, मेरी अपेक्षायें यही रहेंगी तथा इन्हें निकट भविष्य में कोई सरकार पूरा नहीं करेगी, मोदी सरकार भी नहीं। जो होना चाहिये, उसे बिना लाग लपेट के रखते रहना चाहिये, दृष्टि स्वच्छ बनी रहती है तथा जनचेतना भी । 
यदि मोदी भी नहीं करेंगे तो उनके समर्थन में इतना लगे क्यों? 
पहले की एक घटना सम्भवत: यहाँ बता चुका हूँ। पुराने समय में एक निर्धन सवा रुपया लेकर आपण गया। पंसारी के यहाँ जब भुगतान करने हेतु मोर्ही में हाथ लगाया तो पाया कि रुपया कहीं गिर गया था। उसने बची चवन्नी भी फेंक दी तथा बिना अन्न के ही घर लौट आया। पत्नी ने पूछा तो सच बताते हुये बोला कि रुपया गिर गया तो चवन्नी का क्या? उसे भी फेंक दिया ! उसकी पत्नी ने सिर पीट लिया कि कैसे करमजले से मेरा लगन हो गया! 
... मोदी को समर्थन उस चवन्नी को बचा लेने का उपक्रम है जिसमें आगे सवा के सवा क्या, सैकड़ा भी करने की आशा है, उत्साह है, कर्म है तथा सामर्थ्य भी। 

मोदी देश के पहले 'युवा' प्रधानमंत्री हैं जिनके तार 'भारत' से जुड़े हैं, जो इण्डिया से आने का न दम्भ रखते हैं, न ही चाहना। उनके पीछे न जातिवादी राजनीति कर सञ्चित अकूत खानदानी धन है, न ही नेहरू-गांधी खानदानी होने की सम्पदा। वे अपने लिये नहीं, अपने खानदान के लिये नहीं, देश के लिये जीत एवं करते हैं। वे पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं जिनसे भेड़ चराने वाले यायावर से ले कर अरबपती उद्योगपतियों तक, सबकी प्रशंसा एवं महती आकांक्षायें जुड़ती हैं। स्विस बैंकों में धन भरते हुये जनता के आगे 'मनरेगा' के रूप में टुकड़े नहीं उछालते। मोदी ने वह कर दिखाया है जिसे प्रतिमान व्यूहन paradigm shift कहते हैं। मोदी देश की प्रसुप्त सामर्थ्य को नेपथ्य से रंगमंच पर लाये हैं। मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत से जुड़े हर नाम, हर उपादान की प्रतिष्ठा बढ़ाई है। मोदी ने यह दिखा दिया है कि 'सशक्त' देश क्या होता है। भले हिन्दुत्त्व को ले कर उन्हों ने एक शब्द न बोला हो, मोदी के कारण ही आज सोशल से ले कर ओल्ड मीडिया तक, हिंदूवादी जन विविध प्रकार से अपने को अभिव्यक्त कर रहे हैं, लड़ रहे हैं। जाने कितने मञ्च बन चुके हैं। मोदी प्रधानमन्त्री रह गये तो ऊपर जो बातें लिखीं हैं, उनके लिये मार्ग शनै: शनै: बनेगा क्योंकि अंतत: होना उसी जनता के दबाव से है जो अनुकूल वातावरण में प्रक्रिया को वैसा बनायेगी।    
उनके कार्यकाल के बीच के तीन वर्षों में आप मेरी अनेक कटु उक्तियाँ पायेंगे क्योंकि परिणाम की बात नहीं, ऊपर जो लिखा है, उन पर कोई दिशा ही नहीं दिख रही थी। चौथे वर्ष तक विकल्‍पों की दरिद्रता स्पष्ट हो गयी, इस देश का दुर्भाग्य भी कि सवा अरब से भी अधिक जनसंख्या उनसे अच्छा कोई विकल्प नहीं ला पाई जब कि मोदी निश्चित गति से निश्चिंत बढ़ते गये। जो दिशा ली उसे शक्ति एवं सौंदर्य से भर दिया। 
लगता गया कि विपक्ष की आँख केवल एवं केवल सत्ता प्राप्ति द्वारा मोदी के प्रयासों से जुटी समृद्धि की लूट में है। लगता गया कि मोदी का रहना इस कारण आवश्यक है कि जो संवेग momentum बना है, वह न टूटे, जो समृद्धि आई है, जो कार्य चल रहे हैं, वे नष्ट न हों। देश एक दिन में नहीं बनते बिगड़ते, बिगड़े को बनाने में दशकों का तप लगता है तथा मोदी जैसा राजनीति में आज तपस्वी कौन है? 
मैंने निर्णय किया कि अपने निर्णय को टालते हुये चुनावों तक मोदी के पक्ष में ही लिखना है। जब युद्ध का निर्णायक क्षण आये तो उपस्थित रहना है तथा सम्पूर्ण समर्पण से पक्ष लेते हुये रहना है। आज जब कि अंतिम चरण के चुनाव समाप्त हो गये, मैं अपने स्थगित निर्णय को लागू करने जा रहा हूँ। इस मञ्च पर इस प्रारूप में मेरा यह अंतिम लेख है। जो मुझे पढ़ते हैं, वे एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक की अवधि में अवश्य ही एक बार देखते होंगे, उन्हें सूचना मिल जाये, इस कारण यह लेख तब तक रहेगा। तृतीया को जब कि चंद्र मूल नक्षत्र में होंगे, यह खाता अनुपलब्ध हो जायेगा। पूर्वाषाढ़ नक्षत्र मेरे लिये नये आरम्भ का समय होगा। 
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चुनाव परिणामों तक रुकने का कोई अर्थ नहीं है। रुका तो इस निर्णय को अनिवार्यत: परिणामों से जोड़ कर देखा जायेगा। लोकतंत्र में सरकार जनता चुनती है, एक बने बनाये पञ्जर की सीमाओं में रह कर चुनती है। जैसी जनता, वैसी सरकार। मोदी जी दुबारा आये तो सकारात्मक परिवर्तन संवेगी रहेंगे, नहीं आये तो भिन्न प्रकार के संघर्ष पुन: करने होंगे, उस स्थिति में लगा कि मैं एक गिलहरी की भाँति तुच्‍छ योगदान कर सकता हूँ तो अवश्य आऊँगा। अभी तो अपनी सीमाओं का पूरा ज्ञान हो चुका है तथा जब सीमायें ज्ञात हो जायें तो नये क्षेत्र का संधान ही कर्तव्य होना चाहिये - चरैवेति, चरैवेति। यहाँ मेरा लिखा पानी के बुलबुले की भाँति ही होता है - स्थायी प्रभाव से हीन। मेरी तो है ही, सीमा मञ्च की भी हो सकती है, लोगों की भी या संयुक्त प्रभाव भी, परंतु है तो है।  
धन्यवाद फेसबुक प्रबंधन को कि अपनी सेटिंग इतनी तगड़ी रही कि एक दशक लम्बे साथ में कभी न छुट्टी पर भेजा, न ही ब्लॉक किया! अपनी बात रखने हेतु मञ्च प्रदान किया, भले कभी कभी कष्ट भी दिया। 
आप सबसे बहुत कुछ सीखा। आप लोगों से बहुत प्रेम एवं सम्मान मिला। जाने कितने अद्भुत मित्र एवं समर्थक मिले, ऐसे कि एक बार मिला तक नहीं, किंतु कहने पर बहुत कुछ कर गये! उन्हें आभार कहने में भी संकोच होता है। 
मेरे कहने पर केवल साँस भर लेते सुधर्मा संस्कृत दैनिक पत्र हेतु लोगों ने अंशदान दिये। भले लघु हों, जाने कितने अभियानों में आप लोग पूर्ण समर्पण से लगे।
यहाँ रहते हुये पूर्णत: नि:शुल्क, पूर्णत: प्रचार मुक्त मघा पत्रिका की नींव पड़ी, भले धन एवं समय मेरा लगा, चल निकली तो आप लोगों के कारण, ऐसे मित्रों के कारण जो पीछे से बहुत कुछ सँभालते हैं - समानशीलव्यसनेषुसख्यम् । 
सनातन युवा न्यास स्थापित हुआ तो आप लोगों के कारण। जब भी माँगा, लोगों ने पूर्ण विश्वास के साथ आर्थिक योगदान भी किये। आप सबका आभारी हूँ कि ये दोनों आगे भी अपने लक्ष्य हेतु लगे रहेंगे। 
श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम पापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा चरैवेति चरैवेति ...  


यहाँ जो पेज हैं, वे सक्रिय रहेंगे। जिन्हें रुचि हो, वे अनुकरण कर लें या लिख कर रख लें : 
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ब्लॉग का पता है - kalyatri.blogspot.com वहाँ आप मुझे अनुकरण कर सकते हैं या ई मेल दे कर जब भी कुछ प्रकाशित हो, सूचना पा सकते हैं।
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एक अन्तिम बात जिसे आप मेरे कल्पनाशील मन की उपज मान उपेक्षित भी कर सकते हैं। इस बार के चुनाव परिणामों को लेकर जब सामान्य जन को इतनी उत्कण्ठा है कि उसने स्वयं ही आगे बढ़ प्रचार किया है, तो उसे कितनी होगी जिसके सिर इन समस्त अपेक्षाओं एवं उत्कण्ठाओं का भार है? सरकार के पक्ष में मुझे नहीं लगता कि जनता ऐसे कभी मुखर हुई थी। अपने ऊपर जो अपेक्षाओं का गम्भीर भार है, उसे मोदी जानते समझते नहीं होंगे, ऐसा नहीं है। प्रज्ञा प्रकरण में मोदी ने जो कहा, वह सम्भवत: उनके अवचेतन की अभिव्यक्ति भी हो सकती है कि लोगों का आसक्ति भाव किञ्चित घटे जिससे कि सम्भावित वैपरीत्य में व्यक्तियों द्वारा निराश प्रतिक्रियाओं की तीव्रता तनु हो। मोदी को ले कर कुछ लोग चरम भावुकता में हैं। आप के बंधु, बांधव, मित्र, सम्बंधियों में ऐसे हों तो चुनाव परिणाम के दिन उन पर दृष्टि रखें, विपरीत परिणाम आने पर उन्हें सांत्वना दें। इस देश ने बहुत कुछ देखा है, इतना भंगुर भी नहीं कि पाँच वर्षों का आघात न सह सके! लोग अब जाग कर उठ चुके हैं, अवांछित सरकार द्वारा किये गये अवांछित कर्मों पर लगन से लड़ेंगे।        
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अग्ने व्रतपते व्रतञ्चरिष्यामि तच्छकेयन्तन्मे राध्यताम् । 
इदमहमनृतात्सत्यनुपैमि ॥ 

Saturday, May 18, 2019

उड़ते तीर


उड़ते तीर आँखों में न लें, दूरदृष्टि बनाये रखें।
...
इस धरा पर भाँति भाँति के लोग हैं। विविध रंग, रूप, वेश, भाषा, सामान्य स्वभाव आदि वाले तथा इनमें से प्रत्येक समूह का सकल मानवता को कुछ न कुछ दाय अवश्य है, सबके सिर कोई न कोई उपलब्धि अवश्य है। यहाँ तक कि पाकिस्तान भी वैश्विक आतंकवाद का पालना है। प्रलय में सब लय हो जायेंगे किंतु तब तक प्रत्येक मानव समूह का यह कर्तव्य है कि अपना दाय सम्पूर्ण समर्पण एवं सतत उत्कृष्टता के साथ मानवता को अर्पित करता रहे। विवेकानंद के कहा था कि भारत का दाय धर्म है। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत भौतिक प्रगति नहीं करेगा, अवश्य करेगा परंतु उसका सिरमौर धर्म ही रहेगा।
कभी पुरातन पर्सिया तक भारत की सीमा थी। तुर्की, तुर्कमेनिस्तान, कजाक आदि से भी उत्तर तक आप के अवशेष आज भी पाये जाते हैं। मेसोपटामिया तक आप के सार्थवाह एवं व्यापारी अपना ध्वज लहराते थे। धर्म कटता गया, आप कटते गये। आज कश्मीर अनमन आप के साथ है। पञ्जाब पर खालिस्तान एवं इसाइयों का दबाव है, केरल एवं बंगाल देख ही रहे हैं। तमिलनाडु प्रशांत ज्वालामुखी है, जाने कब भभक उठे।
धर्म वह है जो प्रवाहित रहे। उपनिषदों का चरैवेति चरैवेति ऐसे ही नहीं है। चलेंगे तो प्रवाह होगा, परिवर्तन भी। पहले चलना सुनिश्चित करना होता है तथा आगे दिशा। हम चूकते चले गये जिसे आज की स्थिति से भी समझा जा सकता है।
विश्व की १३० अरब जनसंख्या आगे पाँच वर्ष अर्थात एक वैदिक युग कैसे रहेगी, इस हेतु चुनाव चल रहे हैं तथा हम कूड़े के ढेर में सभ्यता का उत्खनन कर रहे हैं! विश्व की धर्मध्वजा भारत गांधी, गोडसे, साध्वी, मोदी से बहुत अधिक महत्त्व रखता है। आप सभ्यता के युद्ध में हैं। युद्ध के निर्णायक क्षणों की दुविधा, भ्रम आदि घातक होते हैं। एक दिन, एक घण्टा, कुछ मिनट ही बहुधा बड़ा दु:खद भावी गढ़ देते हैं। पहले भी हुआ, आज भी हो रहा है कि ध्यान वास्तविक समस्याओं से हट कर अपने स्वार्थ, अहंकार, जाति, क्षेत्र आदि पर सिमट जाता है जब कि उनका भी हम भला नहीं कर रहे होते हैं। अधिक दिन नहीं बीते जब 'कोई माई का लाल' एवं एक विधेयक विशेष जैसे तीरों को आँखों में ले मध्यप्रदेश, राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ भारतद्रोही शक्तियों को एक युग भर शासन हेतु दे बैठे! वहाँ कितने अच्छे परिवर्तन हो गये हैं या हो रहे हैं, वे तो वहाँ के वासी ही बतायेंगे किंतु होगी वह निकट दृष्टि ही।
आप का धर्म, आप का एकमात्र देश एवं आप की एकमात्र भूमि सुरक्षित फलती फूलती रहेगी तभी आप की भावी संततियाँ एवं आप का वर्तमान भी फले, फूलेगा। आप की जाति, आप की भाषा, आप के स्वार्थ आदि तब ही सधेंगे जब अनुकूल शासन तंत्र होगा। दूर की सोचें कि मेवात हो, कैराना हो, श्रीनगर हो या बंगाल के वे क्षेत्र जहाँ से सार्वजनिक घोषणा एवं हिंसा के साथ हिंदुओं को पलायन को विवश किया जा रहा है; आज भारत में अनेक 'दारुल इस्लाम' हैं। आइसिस की घोषणा ऐसे ही नहीं है, वास्तविकता बहुत भयानक है तथा इसाई 'हिंदू आत्माओं की कटाई' में लगे हुये हैं। हजारो एकड़ भूमि मौन रहते हुये चर्च द्वारा क्रीत की जा रही है। इन सबके समक्ष पण्डिज्जी, बाबू साहब, यादव जी या महतो जी के क्षुद्र अहम कहीं नहीं ठहरते।
विचार करें कि मानसिक शीघ्र पतन के स्वभाव ने आप की क्या दुर्गति की है। जातिगत अहंकार एवं स्वार्थजन्य गुटसृजन से आप का कितना भला हुआ है, देश का कितना हुआ है! आँखें खुली रखें, मन को बली एवं तार्किक तथा मस्तिष्क को चैतन्य; आने वाले दिन कठिन परीक्षा के हैं। उलझें न, उलझायें न, अटकें न, अटकायें न। शत्रु का अनुवर्तन न करें।

Friday, May 17, 2019

प्रतिमाओं में अनावृत्त स्तन

 
प्रतिमाओं में अनावृत्त स्तन दर्शाने का अर्थ यह नहीं कि कञ्चुक पहने ही नहीं जाते थे! उसका सम्बन्ध प्रतिमा सौन्दर्यशास्त्र से है जिसमें स्त्री हो या पुरुष, उभरे अंगों के ज्यामितीय सौन्दर्य को उभार कर विविध मुद्राओं में प्रस्तुत किया जाता था। मात्र शिल्प में ही नहीं, साहित्य में भी यही था। स्त्री यदि सुश्रोणी थी तो पुरुष भी वृषभस्कन्ध कहा जाता था।
स्तन एवं नितम्बों का सम्बन्ध मातृत्व से है। कुछ आधुनिक शोध भी देखियेगा कि curvaceous देह वाली स्त्रियाँ शिशु प्रजनन में अधिक समर्थ एवं लालन पालन में उन्हें अधिक सन्तुष्टि देने वाली होती हैं। आदि शंकर के स्तोत्र हों या किसी अन्य के; माता के अंग वर्णन में जो शिशु भाव है, उसे आप जैसी आधुनिकायें नहीं समझ सकतीं।
उत्तर में तो पुराना कुछ बचा ही नहीं, दक्षिण की पूजा प्रतिमाओं को देखियेगा, पुष्ट गोल स्तनों के चूचुक वस्त्र की एक तनु अलंकृत पट्टिका से ढके होते हैं। न, न, न, ऐसा इस कारण नहीं है कि न्यूनतम छिपाव रखना था या शिल्पी को कोई लज्जा थी।
आप का बच्चा तो गोद में रहता नहीं, चक्रपालने में ढोया जाता है। यदि उसे अपनी गोद में रखतीं, गोद का अर्थ जानतीं तो समझ पातीं। चलिये, बता देते हैं।
बच्चा जब रूदन करता है तो भोजपुरिया माँ उसे 'कोरा' में ले लेती है। कोरा संस्कृत का क्रोट है जिससे गोद भी बनी है।
क्रोट वह क्षेत्र होता है जो स्तनों को मध्य से बाँहों द्वारा घेरने से बनता है। उसमें शिशु जीवनदायिनी माँ के दुग्ध स्रोत के निकट होता है तथा उसके लिये वह सबसे सुखदायी क्षेत्र होता है, दूध पिये या न पिये।
जगज्जननी के हाथ तो आशीर्वाद मुद्रा में होते हैं। क्रोट या कोरा या गोद की पूर्ति उस अलंकृत पट्टिका से की जाती है जिससे कि भक्त उनके समक्ष हो तो शिशु एवं मातृभाव का एका हो जाय। हाँ, वह पाषाण प्रतिमा मात्र नहीं, प्राणप्रतिष्ठित साक्षात जननी होती है।
क्या है कि आप पूर्णतः भिन्न एवं निकृष्ट मञ्च पर हैं, वहाँ से उतरने पर भोग एवं भोजन, दोनों के लाले पड़ जायेंगे। उतरें न किन्तु अपना मुखविवर घृणित स्थापनाओं हेतु न खोलें।


Monday, May 6, 2019

अक्षय तृतीया पर : तीन अभिशप्त राम


पारम्परिक इतिहास में तीन राम हुये हैं :
(1) भृगुवंशी महर्षि जमदग्नि के पुत्र जामदग्न्य राम।
(2) इक्ष्वाकुवंशी दशरथ के पुत्र दाशरथि राम।
(3) वृष्णिवंशी वसुदेव के पुत्र वासुदेव राम।

उल्लेखनीय है कि तीनों दशावतार में आते हैं तथा भारतीय इतिहास का यह विचित्र सत्य है कि तीनों के कथानक को या तो स्वार्थ वश या कलह में या जातिवाद के प्रभाव में या समय की माँग के अनुसार कलंकित कर दिया गया जिनसे उनका मूल चरित्र ही दूषित हो गया तथा आज परम्परा के जड़ अनुयायी इस कार्य के औचित्य को सिद्ध करने हेतु जाने कितनी व्याख्यायें रचते हैं किंतु मूल ग्रंथों के वर्णन में सत्य झाँकता ही रहता है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता।

भार्गवों के ऋग्वैदिक आप्री सूक्त के पिता के साथ संयुक्त द्रष्टा राम जामदग्न्य को प्रतिहिंसक, क्रूर एवं अहंकारी 'परशुराम' बना दिया गया जिसने इक्कीस बार धरा से क्षत्रियों का संहार किया तथा निर्दोषों के रक्त से समंतपञ्चक क्षेत्र में पाँच कुण्ड भर दिये।
उस रक्त से ही उन्हें पितरों का तर्पण करने वाला बताया गया। यह राम गर्भस्थ शिशुओं का भी संहार कर डालता है!

रावण जैसे नृशंस एवं बर्बर राक्षस का संहार करने वाले दाशरथि राम से द्वेष वश पत्नी सीता की अग्निपरीक्षा दर्शाई गयी तथा उसके लिये मानवीय रामायण में असम्भव दिव्य प्रसंग जोड़ा गया। उतने से संतोष न हुआ तो पुन: धोबी के कहने से त्याग कराया गया तथा अंतत: पुन: सतीत्व की परीक्षा देने से पूर्व ही सीता द्वारा भूमि प्रवेश दर्शाया गया। किसी भी उदात्त पुरुषोत्तम चरित्र को दूषित करने का ऐसा उदाहरण इतिहास में नहीं मिलेगा।

आख्यानों एवं पुराणों की कुशीलव परम्परा में यश:गान करने वाले सूत लोमहर्षण से ऋषियों ने भी पुराण सुने एवं सीखे। सूत तो प्रतिलोमज होता है, कैसे सहन होता? तब तीसरे अवतार वासुदेव संकर्षण राम द्वारा मद्यपान एवं विहार की स्थिति में सूत का वध दर्शाया गया, तब जब कि वह ऋषियों को कथा सुना रहे थे।
बलराम कहे जाने वाले संकर्षण के मुख से उनका यह अपराध बताया गया कि नीचकुलजन्मा हो कर ऋषियों से आदृत होता उन्हें कथा सुनाता है!
...
अक्षय तृतीया का उद्देश्य जो हो, अब यह तिथि इन तीन अवतारी रामों पर लगी कालिख को मिटाने हेतु प्रयुक्त होनी चाहिये।    

Tuesday, April 23, 2019

बृहदारण्यक, वसिष्ठ, बलि एवं आचमन


वसिष्ठ का अर्थ श्रेष्ठ(वरिष्ठ) होता है। क्षमा के कारण श्रेष्ठ हुये। क्षमा असामान्य होती है।
... 
देह के विविध उपादान आदि ब्रह्मा के पास पहुँचे कि बतायें हममें से वसिष्ठ कौन है? - को नो वसिष्ठ? 
ब्रह्मा ने कहा कि जिसके उत्क्रमित हो जाने से शरीर पापी माना जाता है, वही वसिष्ठ है -
 उत्क्रान्त इदशरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ।

(शरीर शब्द का अर्थ क्षरण से है, देह का विस्तार से। धातु अर्थ से युवावस्था में देह, स्थविर होने पर शरीर।)
पहले वाणी शरीर तज गयी, वर्ष भर में कुछ नहीं हुआ। ऐसे ही क्रमशः चक्षु, श्रोत्र, मन एवं जनन क्षमता; सब एक एक संवत्सर शरीर छोड़ छोड़ लौट आये किन्तु शरीर जीवित रही।
अन्त में प्राण ने उत्क्रमण करना अर्थात निकलना चाहा तो जैसे सैन्धव अश्व अपना खूँटा उखाड़ देता है, वैसे ही शेष सब को विचलित कर दिया। सबने उसे 'भगवान' कहते हुये अनुरोध किया कि आप न निकलें, आप के अभाव में हम जीवित नहीं रह सकते - भगव उत्क्रमीर्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुम!
प्राण ने कहा, ठीक है, तुम सब मुझे बलि प्रदान किया करो। सबने कहा- तथास्तु, ऐसा ही हो।
तस्यो मे बलिं कुरुतेति तथेति।
प्राण ने उनसे पूछा कि वह तो ठीक है, रहूँगा तो अन्न एवं वस्त्र भी चाहिये, वे क्या होंगे? किमन्नं किं वास?
उत्तर मिला कि कृमि, कीट, पतङ्गों से ले कर जितने देहधारी हैं, सब तुम्हारे अन्न हैं तथा जल ही तुम्हारा वस्त्र होगा - आश्वभ्य आकृमिभ्य आ कीटपतङ्गेभ्यस्तत्तेऽन्नमापोवास।
प्राण के अन्न को इस प्रकार से जानने वाले द्वारा भक्षित अन्न अभक्ष्य नहीं होता। जल को वस्त्र रूप में जानने वाले मनीषीगण जल का आचमन कर के ही अन्न ग्रहण करते हैं। प्राण को वस्त्र से रहित नहीं होने देते!
न ह वा अस्यान्नं जग्धं भवति नानन्नं परिगृहीतं य एवमेतदनस्यान्नं वेद तद्विदा
स: श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचमान्त्यशित्वाचमन्त्येतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते।

...
यही श्रोत्रिय की दैनिक वसिष्ठ बलि है - वरिष्ठ, श्रेष्ठ। ध्यान दें कि देह में, शरीर में जब तक प्राण हैं, बलि हो रही है। यह चेतना रहे, इसके साथ पोषण करें तो आप मर्त्यलोक में ही किसी पारलौकिक आयाम के हो जायेंगे।
इस पर भी ध्यान दें कि अन्न एवं आहार को ले कर शाक एवं मांस का वाद विवाद उस स्तर पर बहुत ओछी बात है। कोई जिये तो वैसे!
आचमन का मर्म समझ में आया?
ब्रह्मविद्या या आत्मविद्या क्षत्रियों की कही गयी है। ऋषिगण अपने पुत्रों के साथ राजाओं से सीखने जाते थे। कर्तव्य पालन करता हुआ क्षत्रिय या कोई भी दिन रात बलिकर्म में है, वसिष्ठ को अग्रसर है जो कि राजन्यशिरोमणि इक्ष्वाकुओं का पुरोहित है। ताना बाना बहुत सुन्दरता से गढ़ा गया है, समझें तो!
चेतना के विविध स्तर हैं, एक ऊँचाई के पश्चात आहार गौण हो जाता है। वहाँ पहुँचें तो! 

Friday, April 19, 2019

क्रूरान पर एक टिप्पणी

मोहमद के क्रूर मजहब के पूर्व का अरब साहित्यिक रूप से उन्नत था जिसे मोहमद की महिमा बढ़ाने के चक्कर में जाहिल बताना मुस्लिम जमात हेतु सदियों से सवाब का काम रहा है। ढेर सारा फर्जीबाड़ा किया गया जिसमें वर्तमान की क्रूरान भी है। जिहादी जुबान उर्दू में तरही गजल एवं मुशायरे का चलन है जिसमें प्रसिद्ध रचनाओं से टुकड़े उठा कर उसी लय में अन्य रचनायें लिखी पढ़ी जाती हैं। इस चलन के मूल में क्रूरान की रचना का रहस्य छिपा है। अनपढ़ मोहमद अपने से पूर्व एवं प्रसिद्ध समकालीन अरबी कवियों की 'तरह' के काव्य में अपनी विक्षिप्ति को रचता था। इसमें कोई बड़ी बात नहीं, ऐसे अनपढ़ उदाहरण हमें अपने गँवई परिवेश में भी दिख जाते हैं। जब मुसलमान क्रूरान की 'तरह' का कुछ रचने की चुनौती देते हुये उसे आसमानी किताब बताते हैं तो वस्तुत: वह 'तरही' चुनौती प्राचीन अरबी कवियों की प्रतिभा से जुड़ती है जिसमें मोहमद का कुछ नहीं।
 एक बार मोहमद की बेटी पिता की किसी रचना को गाते हुये अपनी सहेली से मिली जिसका पिता प्रसिद्ध कवि था तो उसने टोका कि यह तो मेरे अब्बा का रचा है जिसे तू अपने बाप की बता रही है। दोनों में इस पर झगड़ा हो गया।
वर्तमान में उपलब्ध क्रूरान खलीफा उस्मान की देन है जिसने एक संस्करण को छोड़ शेष सभी जलवा दिये, ढूँढ़ ढूँढ़ नष्ट करवा दिये। आज भी कहीं न कहीं से भिन्न क्रूरान अवशेष मिल जाते हैं जिन्हें सऊदी दबाव में ठण्डे बस्ते में डाल दिया जाता है।
क्रूरान मोहमद के मरने के पश्चात लिखी गयी जिसके अंश उसके आततायी गिरोहियों ने अपने अपने ढंग रट रखे थे तथा जिनके आधार पर मुसलमानों ने अनेक संस्करण रचे। उस्मान ने भ्रम की स्थिति से निपटने हेतु उक्त काम किया। जिस प्रकार पॉल ने जीसस को गढ़ा, उसी प्रकार उस्मान ने मोहमद का वर्तमान उपलब्ध रूप गढ़ा। इस्लाम की सफलता का कारण बर्बर लूट, बलात्कार, विनाश को संस्थागत रूप देना था जिसमें माल-ए-गनीमत सवाब था तथा २५ प्रतिशत मोहमद द्वारा रख लेने के पश्चात सभी लुटेरों में बँटता। खूँखार दस्युमण्डली के लिये जर, जोरू, जमीन का आकर्षण बहुत प्रभावी हुआ जिसमें कोई नैतिक निषेध नहीं थे। मोहमद ने पहले से उपलब्ध ऐसे तत्वों को संगठित किया जो मार काट प्रवीण होने के कारण सामान्य जन पर भारी पड़े। उसके मॉडल को आज के आई एस की सफलता से समझा जा सकता है।
क्रूरान की कथित काव्यात्मक भावप्रवणता अब लुप्त पुरातन अरबी काव्य की अनुकृति के कारण है। सामग्री या तथ्य की दृष्टि से क्रूरान का अपना कोई शुभ नहीं है। लूट, हत्या, यौन अत्याचार, दास बना कर मनुष्यों का व्यापार आदि को जायज बना देने की दृष्टि से क्रूरान अवश्य अनूठी रचना है, न भूतो न भविष्यति।
कुछ वैसा ही जैसे शिवताण्डव की लय एवं छन्द में 'तरही तोतानामा' रच कर उसे आसमान से उतरी दिव्य वाणी बता दिया जाय। क्रूरान में ऐसा कुछ भी शुभ नहीं है जो पहले से उपलब्ध न हो तथा उससे लाख गुने अच्छे से न प्रस्तुत किया गया हो। क्रूरान की अद्वितीयता उसके 'अपराध मैनुअल' होने में है कि अपराधी मानस अपनी बनाने हेतु किस स्तर तक जा सकता है! 

Saturday, April 13, 2019

घृणा, ज्ञाति ... कुलं विष्णुपरिग्रहम्


कुलं विष्णुपरिग्रहम् 
 ...
कश्यप एवं विनता के संतान गरुड़ के वंशजों में एक का नाम वाल्मीकि भी है। यह कुल परमवैष्णव है। ये कर्म से क्षत्रिय हैं। इनमें दया की भावना नहीं होती। ये सर्पों को अपना आहार बनाते हैं। इस प्रकार अपनी ही ज्ञाति का संहार करने के कारण इन्हें ब्राह्मणत्त्व प्राप्त नहीं है। [महाभारत, उद्योगपर्व] 
...
अयं लोकः सुपर्णानां पक्षिणां पन्नगाशिनाम्
विक्रमे गमने भारे नैषामस्ति परिश्रमः
कश्यपस्य ततो वंशे जातैर्भूतिविवर्धनैः
वैनतेयसुतैः सूत षड्भिस्ततमिदं कुलम्
सुमुखेन सुनाम्ना च सुनेत्रेण सुवर्चसा
वर्धितानि प्रसूत्या वै विनताकुलकर्तृभिः
सुरूपपक्षिराजेन सुबलेन च मातले
पक्षिराजाभिजात्यानां सहस्राणि शतानि च
नामानि चैषां वक्ष्यामि यथा प्राधान्यतः शृणु
सर्वे ह्येते श्रिया युक्ताः सर्वे श्रीवत्सलक्षणाः
सर्वे श्रियमभीप्सन्तो धारयन्ति बलान्युत
ज्ञातिसंक्षयकर्तृत्वाद्ब्राह्मण्यं न लभन्ति वै
कर्मणा क्षत्रियाश्चैते निर्घृणा भोगिभोजिनः
काश्यपिर्ध्वजविष्कम्भो वैनतेयोऽथ वामनः
मातले श्लाघ्यमेतद्धि कुलं विष्णुपरिग्रहम्
दैवतं विष्णुरेतेषां विष्णुरेव परायणम्
सुवर्णचूडो नागाशी दारुणश्चण्डतुण्डकः
हृदि चैषां सदा विष्णुर्विष्णुरेव गतिः सदा
अनलश्चानिलश्चैव विशालाक्षोऽथ कुण्डली
गुरुभारः कपोतश्च सूर्यनेत्रश्चिरान्तकः
वातवेगो दिशाचक्षुर्निमेषो निमिषस्तथा
त्रिवारः सप्तवारश्च वाल्मीकिर्द्वीपकस्तथा
दैत्यद्वीपः सरिद्द्वीपः सारसः पद्मकेसरः
मेघकृत्कुमुदो दक्षः सर्पान्तः सोमभोजनः
सुमुखः सुखकेतुश्च चित्रबर्हस्तथानघः
विष्णुधन्वा कुमारश्च परिबर्हो हरिस्तथा
सुस्वरो मधुपर्कश्च हेमवर्णस्तथैव च
मलयो मातरिश्वा च निशाकरदिवाकरौ
एते प्रदेशमात्रेण मयोक्ता गरुडात्मजाः
प्राधान्यतोऽथ यशसा कीर्तिताः प्राणतश्च ते

दया हेतु शब्द प्रयुक्त हुआ है - घृणा। दया नहीं अर्थात निर्घृणा। सर्प हेतु शब्द प्रयुक्त है भोगिन् तथा जाति हेतु ज्ञाति। सर्पों को माता कद्रु की संतान माना जाता है। पिता कश्यप ही थे। इस प्रकार सर्प एवं गरुड में सौतेले भाइयों का सम्बंध हुआ। इससे यह सिद्ध होता है कि अपने रक्त कुल के लोग 'ज्ञाति' कहलाते थे जो जाति से भिन्न संज्ञा रही होगी। महाभारत में ही युधिष्ठिर को 'ज्ञातिनाश' से दु:खी बताया गया है। उससे भी यही अर्थ निकलता है। ... भगवान जी ने अपने एक लेख में ब्राह्मणों हेतु कहा था कि बौद्धों से द्वेष में उन लोगों ने अच्छे अर्थ वाले शब्दों के अर्थ उलट दिये। बौद्धों के यहाँ घृणा का अर्थ दया था जिसे ब्राह्मणों ने उल्टे अर्थ में प्रयुक्त किया। महाभारत की साक्षी अनुसार घृणा शब्द का प्रयोग उसके मूल अर्थ 'दया' हेतु ही है। यह एक महत्त्वपूर्ण साक्ष्य है जो उन लोगों के विरुद्ध पड़ता है जो महाभारत के वर्तमान रूप को बुद्ध का परवर्ती बताते हैं। मुझे लग रहा है कि चचा के पास या तो अन्य साक्ष्य भी हैं या उन्होंने शीघ्रता में यह निर्णय लिया है। संस्कृत कोश भी घृणा शब्द के दोनों, एक दूसरे के ठीक विपरीत' अर्थ बताते हैं। ... यह मात्र एक उदाहरण है कि एक एक शब्द के पीछे कितना कुछ बहुत पहले ही किया जा चुका है तथा परम्परा के लोग जाने कौन से संसार में हैं? कभी आप ने सोचा होगा कि 'घृणा' शब्द के अर्थ को ले कर भी तथ्याभास स्थापित किये जायेंगे? यह भी विचार करें कि उस एक अंश पर ही अटक कर मैं आज यह दे पा रहा हूँ जब कि वहाँ 'लाइक' एवं प्रणाम कर निकलने वाले बहुत हैं। भगवान जी को बहुत ध्यान से पढ़ा जाना चाहिये क्योंकि वह वामपंथी होते हुये दोनों पक्ष देख रहे होते हैं। ... हाँ, बर्बरीकदासानुयायी गण इस कारण मुझे कालनेमि कहने को स्वतंत्र हैं :) मैं तो मात्र यह समझता हूँ कि मेरे हाथ एक महत्त्वपूर्ण सूत्र लग गया है।

Thursday, April 11, 2019

सब कुछ लील कर भी न अघाने वाला काला छेद


काले छेद से कुछ नहीं बचता। काला छेद समय तक खा जाता है। आधी शताब्दी खा गया! काले छेद द्वारा ये ये लील लिये गये:
(1) चेतना कि हमें भी विकसित होना है।
(2) परम्परा, इतिहास, माटी से प्रेम, शत्रु मित्र के अभिज्ञान की क्षमता, उद्योगधर्मिता, शील, सदाचार, नवोन्मेषी मेधा। 
(3) दिन प्रतिदिन बहते स्वेद एवं रक्त के फल।
(4) स्वाभिमान, संगठन, सम्यक बोध

काला छेद अपने जैसे लघु विवर भी जनता रहा जो उससे जो भी बचा खुचा था, लील गये। ऐसा नहीं था कि काले छेद की वास्तविकता से सभी अपरिचित रहे। सैद्धान्तिक रूप से उसकी वास्तविक चरित्र को कितनों ने उजागर किया किन्‍तु काले छेद का सम्मोहन ऐसा था कि लोग अबूझ बने रहे। सम्मोहन निकटता का था। काले छेद के निकट होते ही सबसे पहले भला बुरा समझने की चेतना लुप्त हो जाती है। वस्तुत: जो जो वह लीलता है, वही उसके बने रहने के कारक हैं। लोग उसके निकट न जायें, आहार न प्रदान करें तो काला छेद अन्तर्विस्फोट से समाप्त हो जाये।
काला छेद अमरबेल की भाँतो जन जन की शक्ति चूस कर समृद्ध होता रहा। उसके कारण एक नयी तिरस्कारी अवधारणा का जन्म हुआ - 'हिंदू विकास दर'।
पाँच वर्ष पूर्व काले छेद के रहस्य से यवनिका हटनी प्रारम्भ हुई तथा उस काल का अंत होने तक काले छेद की वास्तविक छवि सबके समक्ष थी। जो केवल सैद्धान्तिक था, अनेक जन की समझ से बाहर था, उसका रूप इस प्रकार सामने रख दिया गया, मानों चित्र हो।
जी हाँ, वह काला छेद भारत का राजनीतिक दल 'कांग्रेस' है। गत पाँच वर्षों में इस राष्ट्र के चहुँमुखी विकास ने दिखा दिया है कि आधी शताब्दी तक कांग्रेस ने कितना कुछ लील लिया! पाँच वर्षों के प्रकाशित वलय ने कांग्रेस रूपी काले छेद का रूप सबके समक्ष रख दिया।
इस काले छेद के निकट न जायें, लील लिये जायेंगे। इसकी मृत्यु केवल इसके द्वारा ही हो सकती है, इसे अपनी मृत्यु मरने दें।
_________
आप आगे के पाँच वर्षों के लिये सरकार चुनने जा रहे हैं। कांग्रेस रूपी काले छेद की वास्तविकता को जान कर अपने हित उसके विनाश हेतु मतदान करें। यह मात्र संयोग नहीं है कि सुदूर ब्रह्माण्ड में, अंतरिक्ष में स्थित एक ऐसे काले छेद का वास्तविक चित्र पहली बार वैज्ञानिक सामने ला पाये हैं जिससे कि द्रव्य तो द्रव्य, प्रकाश तक नहीं बच पाता।
लोकसभा चुनावों के इस कालखण्ड में अंतरिक्षीय काले छेद का वास्तविक चित्र पहली बार बनाया जाना नियति का संदेश है कि मतदान सोच समझ कर करें, अपना एवं देश का भाग्य चमकाने के लिये करें, अपनी मृत्यु मरते भारत के काले छेद कांग्रेस को क्रूर नियति के हाथों सौंप दें। कांग्रेस का नेतृत्त्व न केवल मानसिक रूप से विपन्न है वरन भ्रष्ट एवं निर्लज्ज भी है। निर्णय आप का, देश आप का, भाग्य आप का।    

Sunday, April 7, 2019

नवसम्वत्सर की जन्मकुण्डली पर कुछ यूँ ही


दिक्काल, मनुष्य एवं सकल जीव जाने कितने उलझे अन्योन्याश्रित तंतुओं से सम्बद्ध हैं। सोचता हूँ कि क्या ऐसी कोई विद्या हो सकती है जो किसी निश्चित कालखण्ड के बारे में ऐसी भविष्यवाणी कर दे जो सब पर लगे?

क्या किसी राष्ट्र की 'जन्मकुण्डली' बनाई जा सकती है? वह भी भारत जैसे देश की?

कल ऐसे ही नवसंवत्सर के बारे में ढूँढ़ता भ्रमण कर रहा था, अनेक स्थानों पर इस वर्ष को बहुत बुरा बताया गया था। उत्सुकता वश २०७५ आरम्भ के समय की भविष्यवाणियों को देखा, वे भी कुछ अच्छी नहीं थीं। मैं सोचने लगा कि क्या सच में विगत वर्ष भारतीय जन हेतु कुल मिला कर बुरा रहा?
यह पता नहीं कि ये भविष्यवाणियाँ सम्पूर्ण विश्व की जनसंख्या हेतु होती हैं या केवल भारत देश की। यदि मानें कि केवल भारत हेतु होती हैं, और ऐसा मानने के कारण भी हैं - चतुर्युग केवल भारत भूमि पर होते हैं, ऐसा पुराण कथन उपलब्ध है - तो भी सवा अरब से भी अधिक जनसंख्या पर आगामी ३६५.२५ दिनों का सकल समेकित प्रभाव बुरा ही होगा, ऐसा कैसे कहा जा सकता है?
किसी भी विद्या की सीमायें होती ही हैं, उनसे परे दूसरी विद्याओं का क्षेत्र हो जाता है। योजनाबद्ध ढंग से संधान हो, उद्योग हो तो क्या किसी जनसमूह का कल्याण या विनाश नहीं किया जा सकता? 

समृद्धि पूर्व के सिंगापुर हेतु क्या ऐसी भविष्यवाणियाँ की गयी थीं?

परमाणु बम एवं उसके पश्चात के उठ खड़े हुये जापान की?

दो दो विश्वयुद्धों से प्राय: ध्वस्त हो चुके एवं आगे समृद्ध यूरोप की?

जर्मनी के विभाजन की?

नाजियों द्वारा यहूदियों के व्यापक नरसंहार की? आगे इजराइल के निर्माण की?

अभी चल रहे यजिदियों के विनाश की?

कश्मीरी हिंदुओं के पलायन की?

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जाने कितने प्रश्न हैं। स्थूल एवं सूक्ष्म की बातें होती रहेंगी किंतु अनेक ऐसे प्रश्न किये जा सकते हैं कि उन घटनाओं की जिनके कारण मानवता बहुत गहराई से प्रभावित हुई या हो रही है, क्या भविष्यवाणियाँ की गयी थीं?
विद्या के प्रयोग से कौतुक हो या उसे जाँचने के कर्म, विशाल जनमानस को आगत समय के बुरे या अच्छे होने की बता उसके अवचेतन/अचेतन को पूरे वर्ष हेतु प्रभावित कर देने का क्या औचित्य है?
जब ऐसे प्रश्न उठते हैं तो अतिवादी प्रतिक्रियायें होती हैं, एक होती है ज्योतिष विद्या एवं ज्योतिषियों को बुरा भला कहने की, उन्हें कोसने की तथा दूसरी होती है समस्त को उचित बताने की, एक बहुत परिष्कृत विद्या की बहुत परिष्कृत निष्पत्तियों के रूप में प्रस्तुत करने की। भारत में शास्त्रों की न्यूनता आज भी नहीं है, पढ़ने वाले भले न हों; शास्त्रीय औचित्त्य दर्शाना असम्भव नहीं।
अन्य विद्याओं की भाँति ही मार्ग दो अतियों के बीच में है। उस पर चर्चा होनी चाहिये तथा इस पर कि तुलनात्मक रूप से आज जो सफल एवं सुखी देश हैं, उनमें फलित ज्योतिष की कितनी मान्यता है? जनता में कितनी पैठ है? क्या फलित ज्योतिष को नवसंस्कार की आवश्यकता है? वैसे ही जैसे कभी आर्यभट ने गणित का क्या किया था?
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लेख लम्बा था, प्रकाशित करते ही लुप्त हो गया, दुबारा लिखा गया है किंतु वह बात नहीं रही। इसका भी कोई फलित ज्योतिषीय पक्ष हो सकता है :)
किसी भी व्यक्ति पर या विद्या पर या व्यवसाय पर आक्षेप न करें। ज्योतिष उत्कृष्ट विद्या है, गणित एवं फलित पक्ष यिन-यान की भाँति ही एक दूसरे से जुड़े हैं।

इसके अध्ययन अध्यापन का या कहें कि विद्या का ही, वैश्विक स्तर पर, रूप ऐसा ही रहा है। उच्च गणित को आप विविध यवन अक्षरों एवं अन्य चिह्नों के प्रयोग के कारण गाली नहीं दे सकते, इस कारण भी नहीं कि एक अंक के ऊपर दूसरा अंक कैसे चढ़ा दिया जाता है!

Saturday, April 6, 2019

अन्‍धेर नगरी से


भारतेन्‍दु हरिश्चन्‍द्र कृत नाटक 'अन्‍धेर नगरी' से -

छेदश्चन्दनचूतचम्पकवने रक्षाकरीरद्रुमे,
हिंसाहंसमयूरकोकिलकुले काकेषुलीलारतिः । 
मातङ्गेनखरक्रयः समतुलाकर्पूरकार्पासियो:,
एषा यत्र विचारणा गुणिगणे देशाय तस्मै नमः ॥
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सेत सेत सब एक से, जहाँ कपूर कपास।
ऐसे देस कुदेस में कबहुँ न कीजै बास ॥
कोकिला बायस एक सम, पंडित मूरख एक।
इन्द्रायन दाड़िम विषय, जहाँ न नेकु विवेकु ॥
बसिए ऐसे देस नहिं, कनक वृष्टि जो होय।
रहिए तो दुख पाइये, प्रान दीजिए रोय ॥


Sunday, March 24, 2019

Murder by Mali Muslims

मुसलमानों का जिहाद अपना काम मौन रह कर सधे ढंग से कर रहा है। गर्भवती स्त्रियों, बच्चों सहित माली में 100 से ऊपर लोग मार दिये गये हैं। शुतुर्मुर्ग वैश्विक मीडिया में कहीं भी कोई रव नहीं है, सारे मानवाधिकारी मौन हैं क्योंकि इससे इस्लाम का वास्तविक रूप पुन: सिद्ध होगा। 
न्यूजीलैण्ड की घटना एवं कथित इस्लामोफोबिया प्रचार से मानसिक रूप से कुंद सभ्य संसार मौन है। 
माली नहीं जानते? माली अफ्रीका के सबसे सभ्य क्षेत्रों में एक है जहाँ टिम्बकटू है। टिम्बकटू के समृद्ध विद्वत इतिहास को जानना हो तो timbuktu manuscripts लिख कर गुगल अनुसंधान करें। 
विडम्बना ही है कि जिस इस्लामी सम्पर्क से टिम्बकटू की बौद्धिक समृद्धि मध्यकाल में शिखर पर पहुँच गयी, वही इस्लाम वहाँ की सात लाख पाण्डुलिपियों का शत्रु हो गया जिन्हें जाने कैसे कैसे यत्न कर बचाया गया। 
टिम्बकटू इस तथ्य का प्रमाण है कि इस्लाम के रहते सभ्यता एवं संस्कृति सुरक्षित नहीं हैं, भले ही उनको कभी इस्लाम ने ही न समृद्ध किया हो। मात्र 50000 की जनसंख्या वाला टिम्बकटू सांस्कृतिक, मजहबी एवं राजनीतिक शोध के लिये बहुत ही उपयुक्त नगर है। माली देश की स्थिति यह है कि संयुक्त राष्ट्र एवं पश्चिमी सैन्य उपस्थिति के रहते हुये भी वहाँ जिहादी हिंसा रुक नहीं रही। 
क्या आप सिंध से उठाई गयी हिंदू लड़कियों, कश्मीर में आतंक, भारत की किसी भी जामा मस्जिद के निकटवर्ती क्षेत्रों में व्याप्त सामान्य भय एवं गुण्डागर्दी, माली की हिंसा, यूरोप में 51 बच्चों से भरी बस को आग लगा कर नष्ट कर देने के प्रयास एवं ऐसे जाने कितनी ही वैश्विक समस्याओं एवं घटित में एक सार्व तत्व देख पा रहे हैं? देख पा रहे हैं कि ये सभी नाभिनालबद्ध हैंं? क्या उसे स्पष्ट रूप से आप कह सकते हैं? 
मस्तिष्क को विस्तार दें तथा वाणी को कष्ट, खुल कर कहें कि वह सार्व तत्त्व इस्लाम है तथा उसके जिहाद में लिप्त सभी योद्धा मुसलमान हैं।
... 
https://www.jihadwatch.org/2019/03/mali-muslims-murder-over-100-people-including-pregnant-women-and-small-children-in-jihad-assaults-on-two-villages

Need for Disaster Management Plan for hazardislam


संकटसम्भावी संस्थानों एवं उद्योग अधिष्ठापनों में जहाँ कि विकिरण सम्बंधी, रासायनिक या विस्फोटक दुर्घटनाओं से जीव एवं सम्पत्ति नाश की प्रायिकता बहुत अधिक होती है, बहुत ही विधि विधान से दुर्घटना कारकों की विनाशक क्षमता के अनुसार उनका वर्गीकरण किया जाता है। मारकता एवं तीव्रता के अनुसार उनको विविध रंग कूट दिये जाते हैं तथा जहाँ वे होते हैं, उसे केंद्र मान कर उनके प्रभाव की भौगोलिक दूरी की त्रिज्या ले कर वृत्त खींचे जाते हैं। चूँकि दूरी के अनुसार मारकता घटती जाती है, एक वृत्त के भीतर भी विविध संकेंद्रीय क्षेत्र होते हैं।
इनके अनुसार ही दुर्घटना की स्थिति में लोगों को वहाँ से दूर ले जाने की प्राथमिकता एवं उपाय युक्तियाँ निर्धारित की जाती हैं। कर्मचारी गण एवं निकटस्थ लोग सावधान रहें तथा सतर्क रहें, इस हेतु छ्द्म दुर्घटना का नाट्य रूपांतरण कर बचाव के सारे उपाय एवं युक्तियाँ इस प्रकार से लगाई जाती हैं मानों वास्तव में दुर्घटना हुई हो। ऐसे नाट्य रूपांतरणों की एक मानक प्रक्रिया एवं अनिवार्य आवृत्ति पारिभाषित होती है तथा दुर्घटना की स्थिति में प्रत्येक कर्मचारी को पहले से ही यह ज्ञात रहता है कि उसकी क्या भूमिका होगा, वह किस बचाव समूह का अंग होगा, आदि इत्यादि। समेकित रूप से इसे आपदा प्रबंधन योजना disaster management plan कहा जाता है। 
गत दिनों एक सज्जन से बात हो रही थी। उन्होंने सुरक्षा से सम्बंधित एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात कही - भारत में समस्त मस्जिदों, दरगाहों एवं चर्च गिरजाघरों का मानचित्रीकरण होना चाहिये, देशांतर एवं अक्षांश के साथ।
मेरे मन में आया कि यदि इसके पश्चात उनकी मारक क्षमताओं के अनुसार मानचित्र पर दुर्घटना प्रभाव क्षेत्र अंकित किये जायें तथा सबसे अधिक घातक प्रभाव लाल रंग से दर्शाया जाय तो पूरा भारत ही 'रक्तरञ्जित' दिखेगा। सहसा ही मुझे मुसलमानों द्वारा विभाजन पूर्व सीधी कार्रवाई दिवस Direct Action Day का स्मरण हो आया तथा यह भी कि यदि आज ऐसा हो तो क्या हमारे पास कोई बचाव योजना है? कोई मानक प्रक्रिया? छ्द्म दुर्घटना आयोजन कर के बचाव उपायों की जाँच करने की कोई आवृत्ति? जापान भूकम्पों हेतु ऐसा करता है।
क्या समस्त सभ्य संसार को इस्लाम हेतु भी ऐसे उपाय नहीं कर लेने चाहिये। वैश्विक स्तर पर जो चल रहा है, उसमें तो यह काम तत्काल किया जाना चाहिये।
मुझे इसका भी भान हो गया कि देवबंद, बरेली आदि ऐसे घातक अधिष्ठापनों में आयेंगे जिनका प्रभाव वृत भारत की सीमाओं से बाहर तक जायेगा ! भारत अंतर्राष्ट्रीय आतंकियों का पालना बना हुआ है। यदि आप को स्वयं देखना हो तो तथा आप किसी ऐसे नगर के निवासी हैं जहाँ मुसलमान जनसंख्या पाँच प्रतिशत भी है किंतु विभिन्न वार्डों में घनीभूत है तो नगर मानचित्र ले कर उसका दुर्घटना मानचित्र बनायें। आप को समझ में आ जायेगा कि मस्जिदें बहुत सोच समझ कर, सामरिकता का ध्यान रखते हुये बनाई गई हैं। साथ ही यह भी कि घिर जाने की स्थिति में वहाँ के अन्य मतावलम्बियों हेतु सिवाय कट जाने के कोई अन्य उपाय नहीं है।
बहुत दिनों से विकिपीडिया की भाँति ही मुसलमानी एवं इसाई अपराधों के एक आँकड़ा एकत्रीकरण जालतंत्र बनाने पर विचार कर रहा हूँ जिनका भौगोलिक मानचित्रीकरण भी उपलब्ध हो। आरम्भ में लगा कि हो जायेगा किंतु अब लग रहा है कि यह एक पूर्णकालिक एवं धनाग्रही काम होगा। चाहे उक्त सज्जन की योजना हो या मेरी, हमारे पास विचार तो हैं किंतु संसाधन नहीं हैं। जिनके पास संसाधन हैं, उनके पास विचार नहीं हैं । इन दो वर्गों का अलगाव वैश्विक स्तर पर बना हुआ है तथा इस्लाम का जिहाद इसी अलगाव के कारण फल फूल रहा है।
इस्लाम में कोई सुधार नहीं हो सकता क्यों कि क्रूरान में नहीं हो सकता तथा वह मजहबी किताब एक ही है जिसका उसके लेखक की शिक्षाओं के साथ पालन करना प्रत्येक मुसलमान का मजहबी कर्तव्य है। मनुष्यों को मुसलमानों से इस कारण ही संकट है कि किताब में समस्त मनुष्यों को या तो मुसलमान बना देना निर्दिष्ट है या उनका विनाश कर देना तथा मुसलमानों में ऐसे सदैव रहेंगे तथा उन्हें अन्य मुसलमान जकात के माध्यम से आवश्यक संसाधन भी उपलब्ध कराते रहेंगे, जो मनुष्यों के विनाश हेतु आत्महत्या करने को सदैव तत्पर रहेंगे। दुहरा दूँ कि समय रहते इस्लाम से बचाव के सक्रिय उपाय पूरे विश्व को उसी भाँति कर लेने चाहिये जिस भाँति नाभिकीय संस्थानों, विकिरण संस्थापनों, घातक रासायनिक संयंत्रों आदि हेतु किया जाता है। सीधी कार्रवाई के आह्वान पर किस दिन कहाँ 'यूनियन कार्बाइड' हो जाये, ज्ञात नहीं।
... हाँ, आप ने ठीक पढ़ा है, मैंने मुसलमानों को मनुष्यों की श्रेणी में नहीं गिना है। वे तो पशु श्रेणी में भी नहीं रखे जा सकते! कारण इस्लाम, क्रूरान एवं उसके लेखक हैं।     

Sunday, February 24, 2019

kashmir-chalo कश्मीर चलो

#कश्मीर‌_चलो 
शैव मत का केन्द्र रहे कश्मीर की ओर दोनों मान्य शङ्कराचार्यों (पुरी एवं शृंगेरी) के नेतृत्त्व में धर्मसंसद प्रयाण करे। शस्त्र तो ले जा नहीं सकते, शास्त्र के साथ जाये। सरकार उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करे। 
ऐतिहासिक भूल के सुधार का लक्ष्य ले कर जाये कि जो भी कश्मीरी मुसलमान सनातन धर्म में लौटना चाहते हैं, उनका स्वागत है। उनके पुरातन सारस्वत मूल को देखते हुये शुद्धि के पश्चात उनका यज्ञोपवीत संस्कार किया जायेगा तथा वे एक नयी जाति के रूप में हिंदू धर्म का अंग बन जायेंगे, यह प्रस्ताव रख दें।
सार्वजनिक घोषणा हो, प्रचार हो, किसी को बुलाने न जायें। जो आते हैं, उनको वहीं दीक्षित कर दिया जाय।
महाशिवरात्रि का पावन दिन निकट है, अवसर प्रत्येक दृष्टि से उपयुक्त है। आगे भी विकल्प खुला रहे।
#कश्मीर_का_इतिहास पढ़ते हुये।
#पण्डित‌_श्री‌_भट्ट की स्मृति में।

Wednesday, February 13, 2019

अपोलो, बंगाल एवं मुसलमान


सप्तर्षिवंशज, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अवर्ण, सवर्ण, पञ्चम आदि अनादि पिछले दस वर्षों से मुसलमानों की सचाइयाँ उघाड़ने के कारण मुझसे पीड़ित होते रहे हैं। अनेक बाधित हुये, बाधित कर गये किन्‍तु उससे सचाई परिवर्तित नहीं हो जाती।
आज पुन: कह रहा हूँ:


आप बहुत बड़े संकट में घिर गये हैं। वह संकट इस्लाम है जिसके वाहक मुसलमान हैं। मुसलमान मानव नहीं होते, कैंसर की भाँति सभ्यता एवं संस्कृति के असाध्य शत्रु होते हैं ।

आप जहाँ भी, जिस स्तर पर भी हैं, जितनी भी शक्ति है; मुसलमानों के प्रभाव को काटते चलें। आरम्भ में लड़ने भिंड़ने की आवश्यकता ही नहीं, मस्तिष्क एवं बटुये के बुद्धिमत्तापूर्ण प्रयोग से एक एक हिन्‍दू चाहे तो इनकी रोकथाम में अपना सार्थक योगदान दे सकता है। सायास, चैतन्य हो कर काम करना पड़ेगा।
...
आज अपोलो चिकित्सालय के सबसे बड़े केन्‍द्र पर जाना पड़ा। मेरी आँखें फटी रह गईं। मुझे हर पल चेताने वाली श्रीमती जी भी कह पड़ीं, ये बंगाली अस्पताल है क्या? बाहर बंगाली चाहे जो बकबक करें, वास्तविकता यह है कि उनका बंगाल नष्ट हो चुका है। किञ्चित भी बड़ी समस्या होने पर स्वास्थ्य सेवाओं हेतु आमार सोनार बांगलाबासी यहाँ धँसे चले आ रहे हैं, यकृत प्रत्यारोपण से ले कर मस्तिष्क गाँठ तक, जिधर देखो, उधर ही बांगाली ... आमार सोनार कोलकाता में ढंग का एक चिकित्सालय भी नहीं, ऐसा प्रतीत होता है।
बंगाली को तमिल नहीं आती, तमिल को बंगाली नहीं, दोनों को अंग्रेजी नहीं आती। ऐसे में परस्पर संवाद की भाषा वही है, उस क्षेत्र की भाषा है जिसका 'हिंदुस्तान' कह कर बंगाली पहले उपहास करते थे, आज भी करते मिल जायेंगे - हिंदी।
जहाँ की भाषा से पेरियारियों ने चुन चुन कर संस्कृत के शब्द निकाल दिये, उस घोर हिंदीद्वेषी तमिल क्षेत्र में तमिल एवं बंगाली जन को हिंदी में दु:ख सुख से ले कर औषधियों के प्रयोग तक की बातें करते पा कर मुझ संकीर्णमना का वक्ष गर्व से ५६! अङ्गुल का हो गया।
हे हिंदीभाषियों ! इस देश को तुम्हारी भाषा हिंदी जोड़े हुये है। हिंदी में निष्णात बनो। हिंदी को शुद्ध लिखना एवं बोलना सीखो। हिंदी को समृद्ध करो, हिंदी को जन जन की भाषा बनाओ। काले अंग्रेज चाहे जो कर लें, तिरस्कृत गोबरपट्टी की भाषा हिंदी ही इस देश की परस्पर संवाद की भाषा रहेगी। तुम्हें गुजरातियों से शिक्षा लेनी चाहिये जो कि आधुनिक हिंदी का पहला गढ़ हुआ तथा जहाँ आज भी हिंदी का ज्ञान होना गर्व की बात है।
...

अच्छाइयों के पश्चात आते हैं सङ्कट पर। सङ्कट यह है कि उन बंगालियों में मुसलमान अत्यधिक संख्या में थे। श्रीमती जी भी मेरी इस बात से सहमत हुईं कि संसाधनों पर ऐसे ही ये 'कब्जा' कर लेते हैं। सीमित संसाधनों की स्थिति हो तो यह स्थिति गुणवत्ता वाली मानव जनसंख्या हेतु बहुत दु:खदायी हो जाती है। जहाँ जायेंगे, वहीं बुरका ओढ़े चुड़ैलें तथा दाढ़ी रंगे, मूँछे छिले, बड़े का कुर्ता, छोटे का पायजामा पहने मियाँ पहले से ही स्थान छेकाये मिलेंगे। स्थिति इतनी गंदी कर चुके हैं कि आसन पर अपना मैला झोला, खून, थूक से सने कपड़े रख मियाँइनें जमी मिलेंगी। लोग खड़े रहें किंतु आसन से झोला हटाना नहीं। हिंदू तो वैसे ही बहुत शेखुलर प्राणी होता है, मियाँ मियाँइन को देखते ही उसके रोम रोम से सद्भावना एवं दीनता रिसने लगती हैं किंतु यदि कोई 'साम्प्रदायिक' हो कर, थेथर हो कहे भी कि ऐ प्रोडक्शन मशीन, तुम्हारा पिस्टन तो इधर उधर घूम रहा है, झोला तो नीचे रख दे कि कोई मानव बैठ जाय! तो काले बोरे में भरी माल की कजरारी आँखों से जलते हुये कोयले बरसने लगते हैं मानों कह रही हों - नामाकूल काफिर! बदजुबान, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ऐसा कहने की? जानता नहीं कि हम तुर्कन-मंगोलन-सैयदन सब हैं। इस दारुल हरब की हर वस्तु पर हमारा पहला अधिकार है!
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मुसलमान गाजर घास हैं, टिड्डी दल हैं, पसरते मरुस्थल हैं। तुर्रा ये कि पूरी ठसक से, अपनी समस्त उज्जडताओं के साथ अपना काम भी कराते हैं।
सबसे बड़ी बात 'आमार सोनार बांगला' के घनचक्कर के कारण इनमें कितने बाँग्लादेशी हैं, आप जान भी नहीं सकते ! कितने घोटाले हो रहे हैं, किसे पता?
...
प्रवचन के अन्त में संक्षेप में जानें कि बंगाल का तो बांग बोका हो चुका है। सावधान रहते हुये सीख नहीं लिये तो आप का भी केरल-कश्मीर होने में अधिक समय शेष नहीं है। सस्य श्यामला को चट करने टिड्डियों का दल प्रजनन में पूरे समर्पण से लगा हुआ है तथा उसका पोषण हिंदू ही कर रहे हैं।
सँभलो, जागो हिंदुओं, जागो!

Monday, February 11, 2019

इन्‍द्र, मेरे लिये दूसरी पत्नी का प्रबन्ध करो !

#पद्मपुराण का विराट यज्ञ आयोजन अद्भुत है। खान पान की सज्जा वरुण करते बताये गये हैं : स्वयं च वरुणो रत्नं दक्षश्चान्नं स्वयं ददौ आगत्य वरुणो लोकात्पक्वं चान्नं स्वतोपचत् ... देवी सावित्री के आने में किञ्चित विलम्ब होने को स्त्रीसुलभ प्रकृति बताते हुये मनोरञ्जक वर्णन है - व्यग्रा सा कार्यकरणे स्त्रीस्वभावेन नागता ! ... सुसत्कृता च पत्नी सा सवित्री च वरांगना अध्वर्युणा समाहूता एहि देवि त्वरान्विता उत्थिताश्चाग्नयः सर्वे दीक्षाकाल उपागतः व्यग्रा सा कार्यकरणे स्त्रीस्वभावेन नागता इहवै न कृतं किंचिद्द्वारे वै मंडनं मया भित्त्यां वैचित्रकर्माणि स्वस्तिकं प्रांगणेन तु प्रक्षालनं च भांडानां न कृतं किमपि त्विह लक्ष्मीरद्यापि नायाता पत्नीनारायणस्य या अग्नेः पत्नी तथा स्वाहा धूम्रोर्णा तु यमस्य तु वारुणी वै तथा गौरी वायोर्वै सुप्रभा तथा ऋद्धिर्वैश्रवणी भार्या शम्भोर्गौरी जगत्प्रिया मेधा श्रद्धा विभूतिश्च अनसूया धृतिः क्षमा गंगा सरस्वती चैव नाद्या याताश्च कन्यकाः इंद्राणी चंद्रपत्नी तु रोहिणी शशिनः प्रियाः अरुंधती वसिष्ठस्य सप्तर्षीणां च याः स्त्रियः अनसूयात्रिपत्नी च तथान्याः प्रमदा इह वध्वो दुहितरश्चैव सख्यो भगिनिकास्तथा नाद्यागतास्तु ताः सर्वा अहं तावत्स्थिता चिरं नाहमेकाकिनी यास्ये यावन्नायांति ता स्त्रियः ब्रूहि गत्वा विरंचिं तु तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम् सर्वाभिः सहिता चाहमागच्छामि त्वरान्विता सर्वैः परिवृतः शोभां देवैः सह महामते ... अध्वर्युओं ने पुकारा, ब्रह्मा जी मुण्डन करा कर आसन ग्रहण कर चुके हैं, आप भी चलें, दीक्षा का समय आ चुका है। सावित्री जी को शीघ्रता नहीं थी - द्वार की शोभा अभी मैंने की ही नहीं, भित्तियों पर विचित्र चित्रण भी नहीं किया, न प्राङ्गण में स्वस्तिक बनाया। भाण्ड (बर्तन) धोये ही नहीं गये अभी तो ! नारायण की पत्नी लक्ष्मी भी अभी तक नहीं आयी हैं, न अग्नि की पत्नी स्वाहा, न यम की पत्नी धूम्रोर्णा, न वरुण की गौरी आयी हैं, न वायु की सुप्रभा, कुबेर की ऋद्धि भी नहीं आई हैं अभी तक, न सारे जग की आराध्या एवं शम्भु की पत्नी गौरी ही आई हैं अभी तक ... ... सावित्री गिनाती गईं, अलानी नहीं आईं, फलानी नहीं आईं, बहुयें, सखियाँ, बहनें, बेटियाँ अभी तक आईं ही नहीं। मैं अकेली जाने कब से सबकी प्रतीक्षा में हूँ। मुझे वहाँ अकेली नहीं जाना। जा के कह दो ब्रह्मा जी से, कि किञ्चित प्रतीक्षा करें, सब आ जायें तो लिवा के आती हूँ झड़क के‍! (बड़ी शीघ्रता लगी है हुंह!) :) मुहूर्त निकला जा रहा था, उस में ब्रह्मा ने जब यह संदेश सुना तो पिनक गये ! ऐ इन्द्र ! मेरे लिये दूसरी पत्नी ले कर आओ - पत्नीं चान्यां मदर्थे वै शीघ्रं शक्र इहानय ! ____________________ घर में यज्ञ आयोजन हो तो प्रकारांतर से यह समझाया गया है कि पुरुष तो अपने बहेड़े करते रहेंगे, घरनियों को चौका पूर देना चाहिये, भित्तियों को सजा देना चाहिये, घर स्वच्छ कर देना चाहिये, ऐसा न हो कि यज्ञ हो रहा है तथा घर में जूठे वासन पड़े हैं। स्त्री सम्बंधियों, सखियों, पड़ोसनों आदि को जुटा लेना चाहिये। ... ... हाँ तो ब्रह्मा जी को दूसरी पत्नी मिलीं एक आभीरकन्या। नाम था - गायत्री। इंद्र जैसे पारखी को भी समस्त ब्रह्माण्ड में वैसी सुंदरी नहीं दिखी थी। परिचय पूछे तो बोली कि आभीरकन्या हूँ, दूध, दही, नवनीत, मट्ठा बेंचती हूँ। जो चाहिये, बताओ, मिलेगा। ... गोपकन्या त्वहं वीर विक्रीणामीह गोरसम् । नवनीतमिदं शुद्धं दधि चेदं विमंडकम् ॥ दध्ना चैवात्र तक्रेण रसेनापि परंतप । अर्थी येनासि तद्ब्रूहि प्रगृह्णीष्व यथेप्सितम् ॥ इंद्र ने बाँह पकड़ी तथा ब्रह्मा के समक्ष ला बिठाये। दोनों एक दूसरे को देख कामबाण से आहत हो गये। विष्णु जी के सुझाव पर ब्र्ह्मा जी ने गायत्री से गंधर्व विवाह कर लिया। ... गायत्री का रूप वर्णन नीचे दिया हुआ है : सरागो यदि वा स्यात्तु सफलस्त्वेष मे श्रमः नीलाभ्र कनकांभोज विद्रुमाभां ददर्श तां त्विषं संबिभ्रतीमंगैः केशगंडे क्षणाधरैः मन्मथाशोकवृक्षस्य प्रोद्भिन्नां कलिकामिव प्रदग्धहृच्छयेनैव नेत्रवह्निशिखोत्करैः धात्रा कथं हि सा सृष्टा प्रतिरूपमपश्यता कल्पिता चेत्स्वयं बुध्या नैपुण्यस्य गतिः परा उत्तुंगाग्राविमौ सृष्टौ यन्मे संपश्यतः सुखं पयोधरौ नातिचित्रं कस्य संजायते हृदि रागोपहतदेहोयमधरो यद्यपि स्फुटम् तथापि सेवमानस्य निर्वाणं संप्रयच्छति वहद्भिरपि कौटिल्यमलकैः सुखमर्प्यते दोषोपि गुणवद्भाति भूरिसौंदर्यमाश्रितः नेत्रयोर्भूषितावंता वाकर्णाभ्याशमागतौ कारणाद्भावचैतन्यं प्रवदंति हि तद्विदः कर्णयोर्भूषणे नेत्रे नेत्रयोः श्रवणाविमौ कुंडलांजनयोरत्र नावकाशोस्ति कश्चन न तद्युक्तं कटाक्षाणां यद्द्विधाकरणं हृदि तवसंबंधिनोयेऽत्र कथं ते दुःखभागिनः सर्वसुंदरतामेति विकारः प्राकृतैर्गुणैः वृद्धे क्षणशतानां तु दृष्टमेषा मया धनम् धात्रा कौशल्यसीमेयं रूपोत्पत्तौ सुदर्शिता करोत्येषा मनो नॄणां सस्नेहं कृतिविभ्रमैः एवं विमृशतस्तस्य तद्रूपापहृतत्विषः निरंतरोद्गतैश्छन्नमभवत्पुलकैर्वपुः तां वीक्ष्य नवहेमाभां पद्मपत्रायतेक्षणाम् देवानामथ यक्षाणां गंधर्वोरगरक्षसाम् नाना दृष्टा मया नार्यो नेदृशी रूपसंपदा ... गोपकन्यामसौ दृष्ट्वा गौरवर्णां महाद्युतिम् कमलामेव तां मेने पुंडरीकनिभेक्षणाम् तप्तकांचनसद्भित्ति सदृशा पीनवक्षसम् मत्तेभहस्तवृत्तोरुं रक्तोत्तुंग नखत्विषं तं दृष्ट्वाऽमन्यतात्मानं सापि मन्मनथचरम् तत्प्राप्तिहेतु क धिया गतचित्तेव लक्ष्यते प्रभुत्वमात्मनो दाने गोपकन्याप्यमन्यत यद्येष मां सुरूपत्वादिच्छत्यादातुमाग्रहात् नास्ति सीमंतिनी काचिन्मत्तो धन्यतरा भुवि अनेनाहं समानीता यच्चक्षुर्गोचरं गता अस्य त्यागे भवेन्मृत्युरत्यागे जीवितं सुखम् भवेयमपमानाच्च धिग्रूपा दुःखदायिनी दृश्यते चक्षुषानेन यापि योषित्प्रसादतः सापि धन्या न संदेहः किं पुनर्यां परिष्वजेत् जगद्रूपमशेषं हि पृथक्संचारमाश्रितम् लावण्यं तदिहैकस्थं दर्शितं विश्वयोनिना अस्योपमा स्मरः साध्वी मन्मथस्य त्विषोपमा ... कुचयोर्मणिशोभायै शुद्धाम्बुज समद्युतिः मुखमस्य प्रपश्यंत्या मनो मे ध्यानमागतम् अस्यांगस्पर्शसंयोगान्न चेत्त्वं बहु मन्यसे स्पृशन्नटसि तर्हि न त्वं शरीरं वितथं परम् अथवास्य न दोषोस्ति यदृच्छाचारको ह्यसि मुषितः स्मर नूनं त्वं संरक्ष स्वां प्रियां रतिम् त्वत्तोपि दृश्यते येन रूपेणायं स्मराधिकः ममानेन मनोरत्न सर्वस्वं च हृतं दृढम् शोभा या दृश्यते वक्त्रे सा कुतः शशलक्ष्मणि नोपमा सकलं कस्य निष्कलंकेन शस्यते समानभावतां याति पंकजं नास्य नेत्रयोः कोपमा जलशंखेन प्राप्ता श्रवणशंङ्खयोः विद्रुमोप्यधरस्यास्य लभते नोपमां ध्रुवम् आत्मस्थममृतं ह्येष संस्रवंश्चेष्टते ध्रुवम् यदि किंचिच्छुभं कर्म जन्मांतरशतैः कृतम् तत्प्रसादात्पुनर्भर्ता भवत्वेष ममेप्सितः